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Saturday, March 27, 2010

घर जल्दी जाने मैं भी लोचा है


कल का दिन सब मायने मैं ठीक था ना ऑफिस मैं ज्यादा काम ना लाइफ मैं कोई नया लोचा । और तो और कल मैं ऑफिस से जल्दी घर जाने का मौका मिला । ऐसा कम ही होता है मेरे साथ तो मैं ऑफिस से निकलते वक्त ही मैंने सोच लिया था की आज घर जा कर क्या क्या करना है मसलन कपडे धोने है या बर्तन । पर कहते है जब उसका रहे  रहम तो फूटे मेरे करम । ऑफिस से निकल कर बस पकड़ने के लिए स्टैंड पर गया तो देखा अरे मर गए इतने जनता लगता है बस काफी देर से नहीं आयी थी मेरा अंदाजा १ मिनट में ही दूर हो गया जो सोचा वही हुआ  तो मैंने एक बार फिर सोचा यार मैंने  कार क्यों न मांग ली । पर चलो कोई नहीं ऐसा मैं बचपन से सोचता आ रहा हूँ । पर कभी सोच नहीं पाया । अब तक मेरे सोचने मैं न जाने कितने ब्रह्म लोक का चक्कर लगा दिया हो पर में वंही स्टैंड पर खड़ा था । मेरे नंबर की बस को छोड़  कर सारी बसें आ आ कर भर भर का जा रही थी और में मूक दर्शक बना देख रहा था । मेरे धोने और धुलने के सपने भी धीरे धीरे धुल रहे थे । पर मैं कर भी क्या सकता था पुनः नया नया ब्लॉगर बना हूँ । तो वो कहावत है न की नया नया ????? खाता है । मुहावरा तो आप समझ ही गए होंगे पूरा इसलिए नहीं लिखा की मैं किसी नए विवाद को जन्म नहीं देना चाहता क्योंकी देश में हर पल कुछ न कुछ जनम हो रहा है और उसके लिए हर कोई हर समय कुछ न कुछ प्रयत्न कर ही रहा है तो में क्यों एस मुझीम का हिस्सा बनू अरे में ब्लॉगर बन कर ही प्रसन्न हूँ । खैर इसी उधेडबुन में ४५ मिनट निकल गए और मेरी बस अभी तक नहीं आयी थी । वक्त इसे गुजर रहा था जैसे पहाड पर चढाई कर रहा हूँ । टाइम पास के न जाने कितने मित्रों और मित्रिओं को सन्देश दिए की कोई नामकुल तो फ्री होगा । पर जब वक्त बस का इंतज़ार करना लिखा हो तो भला कोई दोस्त क्या कर सकता है । किसी भी भले मित्र का जवाब नहीं आया । मेरा गुस्सा अब धीरे धीरे बढ़ रहा था । पर फिर न जाने अचनक देखता हू की एक लाइन से ३ बसों की लंबी कतार चली आ रही है । मैंने DTC को धन्यवाद देना चाहा पर सोचा की पहले बस मैं चढ जाऊ जब दे दूँगा । बस आज तो भीड़ भी कुछ ऐसा ही सोच रही थी । सब ने एक साथ एक ही बस पर हमला बोल दिया और बाकी दो बसे अपने आप आगे चली गयी मनो कोई सेट्टिंग बना रखी थी । खैर मुझे बस मैं तो जगह मिल गयी पर आज मैं समझ गया था की सीट मिलना टेढ़ी खीर साबित होगी । उफ़ मैंने फिर कार क्यों नहीं मांगी ? खैर जैसे तैसे एक सुरक्षित खड़े होने का सतन मिलना भी बस मैं कम कठिन काम नहीं है । पर वो काम मैंने कर लिया था । अब में बस के एक सुरक्षित स्थान पर पूरी तरह अपने दोनों हाथों और टांगो के बल खड़ा था । और व्याकुल नज़रों से कोई कहानी ढूढने का प्रयास कर रहा था । पर आज कोई कहानी नहीं मिल रही थी । पर मैं भी बाबा का शिष्य हूँ कुह न कुछ लिख कर ही दम लूँगा । और वो news nose  का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया अभी मेरे ख्याल से मशीन स्टार्ट ही हुई होगी की नोज़ ने कुछ खोज निकला । बस एक स्टॉप पर रुकी और उसमे एक बड़ी ही कौशल से निपुण महिला ने प्रवेश किया । मैं उसकी एंट्री पर कायल हो गाया उसने शार्क मछली की तरह भीड़ को चीरते हुए महिला सीट को खाली करा अपनी जगह बनायीं और सबके तरफ विजयी मुद्रा मैं देखने लगी जैसे कोई किला फतह कर लिया हो । ये एक किला ही तो है इतनी भीड़ मैं सीट पाना जैसे समुद्र मैं से मोती निकालने के बराबर है । आज के लिए बस इतना क्यों आज शायद बर्तन मुझे ही धोने थे ।



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