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Tuesday, April 12, 2011

कोई सोया नहीं रात भर..


जागती ऑंखें बताती हैं...कोई सोया नहीं रात भर,
याद करता रहा तारे गिन, वो रात भर
बिस्तर की सिलवटें कहती हैं...कोई सोया नहीं रात भर,
गिनते रहे करवटों का बदलना, वो रात भर ।
किताबों में रखे गुलाब बताते है...कोई सोया नहीं रात भर,  
मुरझाये फूलों से पाते रहे खुश्बू का अहसास, वो रात भर ।
खतों कि सूखी स्याही बताती हैकोई सोया नहीं रात भर,
यादों के हर पल को शब्द बनाकर जागते रहे, वो रात भर ।
कमरे का स्याह रंग बताता हैकोई सोया नहीं रात भर,
ख़ामोशी पर भी आवाज़ का अहसास पाते रहे, वो रात भर
उनके साथ बिताये हर पल बताते हैं...कोई सोया नहीं रात भर,
उनकी छुअन का अहसास महसूस करता रहा, वो रात भर ।  

7 comments:

  1. very good vipul... khud ki parchchai batati hei... koy soya nahi rat bhar... parchchayiyon mein khud ko doondthe rahe...

    mein sirf koshish ki hei...galat ho to batana..

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  2. its awsome..i loved it.. i gues every person can relate him/her with your poem

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  3. Very well written dude... ek dum jakkhas...

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  4. Saale thurki, or koi kaam nahi hai iske alawa...
    Good meri jaan

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  5. कोई सोया नहीं रात भर,
    आखों में वो बसे रहे,
    पलके झुकाने से डर लगता रहा रात भर,
    फिर लिया उन्होंने हाथो में हाथ,
    निंदिया कह गयी अलविदा रात भर,
    खामोश रहे उनकी साँसों की खुसबू में,
    धड़कने थमी रही रात भर.

    bahut acha likha hai koi soya nahi raat bhar, vaise to mai tumhari sari poem padhti hu, par aaj ise padh ke do line mujhse bhi likhi gayi...


    WELL Done...

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  6. uth jaag musafir, bhor bhayi ab rain kaha jo sowat hai...

    jo sowat hai so khowat hai jo jaagat hai so pawat hai...

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