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Friday, October 8, 2010

झक्की ड्राईवर सवारी परेशान

जब में छोटा था तो एक बात मेरे मामा ने एक बात कही थी “Every Place has a thing and every thing has a place” ये पूरी तरह से कितनी सही है ये नहीं पता । इस कहावत को याद आने का एक कारण है और उसे कहे जाने के कई । जब मामा ने कहा था तब हम छोटे थे अपना कोई सामान समुचित स्थान पर नहीं रखते थे, पूरे दिन तो नहीं हाँ आधे दिन तो मस्ती जरूर करते थे । और घर वाले आधे दिन सामान को ठीक करने में गुजार देते थे । तब मम्मी की डाट में भी बाद अमाज़ा आता था तो कभी कभी बेलन के प्यार फ्री मिलते थे । और हमारी ही रोटी बनती थी । आंसुओं के साथ रोटी भी नमकीन लगती थी । फिर कभी मामा का प्यार और साथ में माँ का दुलार तो था ही । वो कहावत तब सुनी और आंसुओं से साथ यादों की तरह बह गई ।

इस कहावत का दूसरा पहलु ये है आज हम बड़े हो गए और बस में चलते है जहाँ भिन्न भिन्न प्रजाति के लोग भी आपके साथ चलते है और उनकी अदा भी जुदा होती है । ऐसे ही मुझे यदा कद मिलते रहते हैं अब ३-४ पुरानी बात है है में सुबह घर से बस के लिए निकला शायद मुझे थोड़ी देर हो गई थी । और में झक मार के सरकारी बस में ही चढ़ गया । ड्राईवर कोई 35 से ज्यादा उम्र का होगा और अनुबंधित था । ये उसकी चल से लगता था । मुझे एक बात समझ में नहीं आती की जो लॉन्ग सरकारी नहीं होते है वो सरकारी काम काज को बहुत बीप बीप करते है पर जब उसका हिस्सा बनते हैं तो वो भी वही करते हैं ऐसा मुझे उस ड्राईवर को देख कर लगा । वो इसके पहले शर्तिया किसी निजी कंपनी में ड्राईवर होगा पर वहां ऐसी गाड़ी नहीं चलता होगा इसका मुझे विश्वास है । पूरी सड़क खाली होने के बाद भी वो गति पे कभी भी गति नहीं दे सका । और तो और उसके कुछ अजीब नियम थे । मसलन गेट खाली रहे , शीशा के आगे किसी का बाल भी ना आये , डैशबोर्ड खाली रहे । उसको देख कर मुझे अपने मामा वाली कहावत याद आ आ गयी । बस की भीढ़ को नहीं देख रहा था, वो सिर्फ खुद को देख रहा था । मुझे लगता है अगर इसी तरह वो अगर निजी कंपनी में होता तो भी उसका यही व्यवहार होता या वो सवारिओं के साथ तन्मंता के साथ गाड़ी को चलाता । या ये सब उसके सरकारी विभाग से जुड़ने का नतीजा था । क्या पद आपके स्वाभाव या सोचने के लिए काफी है या आप कभी उससे उपर भी जा सकते हैं । क्या यही वो सोच है जो सरकारी और निजी कर्मचारी को प्रथक करती है । उसके काम करने का तरीका । और क्या वो जब तक सरकारी अनुबंध पर है वो इसी तरह से गाड़ी चलाएगा और जब वो निजी कंपनी में जायेगा तो पुनः पहले की भांति रफ़्तार से चलेगा । यही ख्याल मेरे मन में लगातार अंत तक रहा क्योंकि उस दिन उस ड्राईवर के इस तल्ख़ रवैये केकारण कई लोगों की बस छूटी । और न जाने कितने लोग ऑफिस जाने से महरूम रह गए होंगे । शायद किसी का इससे ज्यादा नुक्सान हुआ होगा ।

Monday, April 19, 2010

बस हुई खराब और रविवार हुआ बर्बाद

पता नहीं कभी कभी मुझे क्या होता है की मेरा मन अचानक किसी काम में नहीं लगता है ।  और कभी कभी ऐसा होता है मन या तन मन धन सब के सब उसी में लगता है । इसका कारण मैं आजतक नहीं जान पाया । और आगे का भी कोई इरादा नहीं लगता । इसका भी कारण पता नहीं है । शनिवार को काम कुछ नहीं था । बस चंद लाइन का काम करके परे दिन फरारी कटी ऑफिस में । कभी इधर जाता  कभी उधर जाता । क्योंकि कोई काम नहीं था और अगर बॉस के सामने आता तो वो कोई न कोई काम थमा देते जो मुझे करना पड़ता । इससे अच्छा था की झूठे काम का बहाने बनाते रहो और टाइम पास करो । जैसे तैसे दिन पल पल कट रहा था । हर पल पल पल पर भारी था ।  कभी तो पल मुझे पर भारी पड़ता तो में सोफे पर भरी हो जाता । और झूठे चिंतन की मुद्रा बना कर पल पल को धोखा देने की कोशिश करता । कभी खुद को लगता की सफल हो गया तो कभी लगता नहीं यार थोडा और काम करना है अभी । चलो जैसे तैसे करके शाम में ५ बजे घर जाने का प्लान बना । अब तो बैचेनी और बढ़ गयी थी । ऑफिस से निकला तो लगा क्यों निकल आया । ऑफिस में ही अच्छा था । मुझे जादू का वो संवाद याद आ गया धूप । रोड आज उतनी ही खाली थी जितनी अन्य दिनों भरी रहती है । मैं भी जादू को याद करता हुआ बस स्टैंड की तरफ रवाना हो गया । सोचा की शायद बस जल्दी मिल जाये तो काम बन जाये और में ऑफिस से घर  जल्दी पहुच जाऊ पर हाय रे मेरी किस्मत । ऐसा उस दिन भी नहीं हुआ । में बस स्टैंड पर खड़ा खड़ा धूप धूप करता रहा और बस उतनी ही देर से आई और जब आई तो सारी उम्मीदों पर पानी फेरती हुई आई । क्योंकि बस ठसाठस भरी हुई थी । और बड़ी मुशील से एक सुरक्षित जगह पर खड़े होने लायक सीट मिल पाई । अब तो थोडा थोडा गुस्सा भी आ रहा था की ऐसा मेरे ही साथ होता है या कोई और भी इसका भागीदार है जिसे मुझे ही ढूंढ कर अपना गम बांटना पड़ेगा । बस आज अपने रफ्तार पर थी और मुझे लगा की अगर ऐसी ही बस चलती रही हो शायद ये आधे घंटे में मुझे अपने स्टॉप तक पंहुचा दे । पर वो कहावत है न की जब आपकी किस्मत खराब हो तो ऊंट पर भी बैठ जाओ कुत्ता जरूर काट खायेगा । वही कुछ हुआ मेरे साथ । १५ मिनट बाद ही बस खराब हो गयी । और बस ने न चलने की कसम खा ली । अब तो गुस्से के से मेरे साथ साथ कई लोंगो का परा तापमान का साथ दे रहा था । और शायद तभी उस दिन रिकॉर्ड गर्मी थी ।पूरे १ घंटे के करीब धूप धूप करने के बाद बस ने अपनी पुरानी चाल पकड़ी पर इस  बार बस नयी थी मतलब दूसरी थी । और मज़े की बात ये थी की इस बार में सीट पर बैठा था और जो पिछली बस में बैठा था वो खड़ा था । मुझे अंदर से थोडा थोडा अच्छा लगने लगा था । इसमे मेरी कोई गलती नहीं है की मैं बैठा ये उस महोदय का ही निवेदन था की मैं बैठ जाऊ । क्योंकि उनका कहना था की वो दिन भर बैठे ही रहते है । तो उनको बस में बैठना उतना पसंद नहीं है । तो उन्होंने अपनी सीट स्वेच्छा से मुझे दे दी । मैं भी बड़ी इच्छा से उस पर विराजमान  हो गया । और तब तक रहा जब तक मेरा स्टैंड नहीं आ गया । पर उस दिन का बुरा साया रविवार तक मेरे साथ रहा । जिसने मेरा रविवार बर्बादवार बना दिया ।