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Monday, January 28, 2013

इत्तेफाक


इत्तेफाक

मेरी दिल्ली में पहली पोस्टिंग थी. कहते हैं दिल्ली दिलवालों की है. मुझे भी पहले दिन ऐसा ही लगा था जब में ऑफिस पहली बार पंहुचा. ऑफिस के हर आदमी ने मेरा दिल खोल कर स्वागत किया. उनमे से कुछ लोग मेरे ही तरफ के निकले तो, दिल को तस्सली मिली कि चलो कोई तो मिला अपनी तरफ का. सरकारी दफ्तर में पहला दिन बिलकुल नई नवेली दुल्हन कि तरह होता है. सब उत्सुकता से देखने आते हैं, बड़े ही प्यार से बात करते है और परिवार के बारे में कुछ ना कुछ बता कर जाते है जैसे वही सबसे बड़े हितेशी हों. मेरे साथ भी यही हुआ. सब ने अपने तरफ से मुझे ऑफिस के बारे में बताया, मैंने भी नई दुल्हन कि तरह बिना बोले सर हिला कर सहमति दे कर उनको खुश किया.

दोपहर के 12 बज चुके थे, ऑफिस का पहला दिन था इसलिए लंच नहीं ला सका था. लंच तो मैंने ऐसे  कह रहा हूँ जैसे में खुद बनाता हूँ. इसलिए सभी ने मुझे अपने साथ लाए लंच में शामिल किया और भारत के हर तरह के खाने के साथ पेट में एक प्रकार की खिचड़ी बन गयी. खाना खाने के बाद कुछ काम ना होने के कारण नींद आ रही थी तो मैंने ऑफिस एक कोने में जगह बना कर कुछ सोचने का नाटक करते हुए नींद लेने कि कोशिश करने लगा. इन्ही कोशिशों में कुछ पुरानी यादें दिन के सपने की तरह आँखों के सामने आ गए.

सहारनपुर का छोटा सा घर, पिता जी के देहांत के बाद माँ कि वो जी तोड़ मेहनत जो उसने मुझे पढ़ाने  के लिए की. मुझे लगता था कि अच्छा हुआ कि मैं इकलौती संतान था वर्ना माँ का क्या हाल होता. फिर जब से मैंने होश संभाला तो खुद से अपनी पढ़ाई के खर्च के लिए मेहनत. बचपन से चौथाई जवानी तक सबसे ज्यादा मेहनत, खुद को सबसे आगे रखने की. फिर रात में जाग-जाग कर बैंक की तैयारी. पर इतने सालों की मेहनत काम आयी. और मेरा सलेक्शन स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर के रूप में हुआ. तभी खट-पट की आवाज़ से दिन के सपने में रुकावट आयी. ऑंखें खुली तो देखा चपरासी बड़े ही अजीब तरीके से घूर रहा था. मैं हड़बड़ा  कर उठा और चलता बना. अब शाम होने वाली थी. ऑफिस के लोगों ने जल्दी जाने की छूट दी. मुझे भी इसी की जरुरत थी क्योंकि कुछ अधूरे कामों को पूरा करना था.

चूँकि में अभी अकेला था इसलिए रहने के लिए किराये का कमरा ले लिए था और उसका किराया कंपनी से ले लेता था (थोड़ा बढ़ा कर). उसे मैं कभी घर नहीं कहता था क्यों घर अपनों से होता था और मेरा कोई अपना नहीं था. सब कुछ जुटाते-जुटाते कब 3 महीने निकल गए पता ही नहीं चला. मेरा कमरा अब तक लगभग सभी जरुरत की चीजों से भर चुका था. पर अब तक कमरा ही था. इसी बीच समय निकाल कर मैं घर भी हो आया. माँ ने अकेलेपन का बहाना बना कर दिल्ली आने से साफ़ मना कर दिया था. अब मैं दिल्ली अपना दिल बहलाने के लिए एक साथी भी ले आया था, मेरे मामा का दिया हुआ कंप्यूटर. जो उन्होंने लोगों को चूना लगा-लगा कर मेरे लिए बनाया था. वो था तो आदम ज़माने का पर था तो कंप्यूटर. चूँकि बचपन से थोडा जुगाड़ कि आदत थी तो मोबाइल से ही कनेक्ट कर के इन्टरनेट का स्लो स्पीड में मज़ा लेने लगा. फेसबुक पर मेरा अकाउंट खुल चुका था. वो भी सबके कहने पर खोल दिया पर प्रयोग ही नहीं करता था.

पर पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर मेरी उपस्थिति हर रोज हुआ करती थी. मैं एक नियत समय पर फेसबुक पर ऑनलाइन होता और सिर्फ एक से ही चैटिंग करता. उसका नाम सारिका था. मेरे ख्याल से मेरे और उसके प्रोफाइल में एक ही बात समान थी वो थी हम दोनों के फेसबुक में मात्र 5 ही फ्रेंड थे. वो दिल्ली में एक प्राइवेट कम्पनी में जॉब करती थी. क्या करती थी ये कभी नहीं पूछा नहीं, ना ही उसकी कंपनी का नाम! कभी-कभी खुद पर गुस्सा भी आता, पर सोचता था पूछने पर कहीं उसको बुरा न लग गया और वो बात करना न छोड़ दे? इसी सब को सोचते-सोचते हमारी बातचीत के करीब ४ महीने हो गए. हमारी बस ऐसे ही किसी न किसी मुद्दे पर बात होती थी. मुझे लगता था कि मेरे मन में उसके प्रति एक खास कोना बन चुका है क्योंकि पिछले 3 महीने में शायद ही कोई दिन रहा होगा जब मैं ऑनलाइन नहीं आया हूँ. इतना तो मैं स्कूल के दिनों में भी अनुशासित नहीं था.

फिर एक दिन मामा का फ़ोन आया और मुझे गाँव बुलाया. मैं छुट्टी लेकर पंहुचा. थोड़ा सा डरा हुआ था कि क्योंकि इस तरह मामा जी ने मुझे कभी बुलाया था और अब कुछ दिन सारिका से बात न कर पाने का दुःख भी था. घर पंहुचा, तो देखा सारा का सारा कुनबा जमा हुआ है. मामा, मामी, मौसी, मौसा और न जाने कौन-कौन. मेरे मन मैं कई तरह के सवाल उठने लगे. मामा ने मेरे पूछने से पहले मुंह में एक लड्डू डालते हुए बोले “बेटा बधाई हो घर में दुल्हिन आ रही है”. मैंने भरे हुए मुंह से बोला “मतलब मामा आप इस उम्र! छी छी आपको शर्म नहीं आई. अब मामी का क्या होगा”. मामा बोले “चल हट गधे”. हम तो अभी ही तैयार हैं पर तुम्हारी मामी ही नहीं मानती. मैंने हँसते हुए बोला बोला फिर? मामा बोले तुम्हारी शादी पक्की कर दी है और घर में तुम्हारी दुल्हिन आ रही है. मुझे काटो तो खून नहीं. अब लड्डू मुझे मीठा से ज्यादा कड़वा लग रहा था. माँ को देखा तो वो आंसुओं के समंदर में खुश थी. फिर उस रात मैंने मामा को समझाने कि लाख कोशिश की पर बात न बनी. अपनी होने वाली दुल्हन के बारे में बस इतना पता चल कि वो लखनऊ की है और वहीँ से एमबीए करके दिल्ली में मौसी के यहाँ रह कर नौकरी करती है. पापा लखनऊ में ही पशु चिकित्सक हैं पर डिस्पेंसरी कम ही जाते हैं. लड़की छोटी है, बड़ी बहन लखीमपुर में ब्याही है. जीजा थोड़ा कम कमाता है पर जमीन जायदाद से अमीर है.

3 दिन के बाद घर से आया और आते ही ऑफिस चला गया. दिल में में एक अजीब कि कसक थी, क्या थी वो मुझे खुद न पता थी. पता नहीं कैसे ऑफिस वालों को शादी का पता चल गया था. पूरे दिन ऑफिस में उसी की बात चलती रही. जैसे-तैसे ऑफिस से घर पंहुचा, खटारा खोल कर फेसबुक चेक किया तो सारिका का एक लम्बा चौड़ा मैसज था. जिसमे उसने लिखा था कि “अब वो शायद ही ऑनलाइन आए क्योंकि उसकी शादी पक्की हो गयी है. और मैं अपने घर वापस जा रही है. तुमसे बात करके अच्छा लगता था और अगर मेरे पास थोड़ा समय होता तो तुम्हारे बारे सोचती. पर ऐसा नहीं हो सका. और तुमने कभी मिलने के बारे में भी नहीं पूछा न ही मैंने कभी. जिसका मुझे ता उम्र अफ़सोस रहेगा. जिससे मेरी शादी पक्की हुई है वो बैंक काम करता है. पता नहीं शादी के हमारी मैं जॉब करू न करू. पता नहीं तुमसे मेरी बात हो न हो इसलिए आज ही कह रही हूँ मुझे तुम अच्छे लगते थे और सच्चे भी. तुम्हारे जवाब की प्रतीक्षा में, तुम्हारी सारिका”, यह पढ़ तो मेरा बचा हुआ दिल भी टूट गया. एक पल के लिए सोचा कि जवाब लिख दूँ फिर सोचा कोई फायदा नहीं. दिल भी साला ऐसे टाइम पर फायदा नुकसान सोचता है ये मुझे उस दिन ही पता चला.
हमारे यहाँ हम कितने ही आगे आ जाएँ पर कुनबा पीछे ही चलता है इसी कारण बात तो दूर शादी से पहले न मैंने अपनी होनी वाली श्रीमती को देखा और शायद उन्होंने भी नहीं देखा होगा.. खैर शादी की घड़ी भी आ गयी. मैं घोड़े पर भी चढ़ गया. गौना भी साथ हो गया. हम वापस कार से सहारनपुर आ गए. चूँकि पहली-पहली बार शादी हुई थी तो मैं नर्भस था. अब तक हमने ठीक से बात भी नहीं की. पता ही नहीं चला कब घर पँहुचे. उसके बाद घर में एक के बाद एक रीती-रिवाज़. रात मैं 11 बजे के करीब अपने कमरे गया जो मेरा नहीं लग रहा था क्योंकि जन्म के बाद पहली बार वो कमरा फूलों से सजा हुआ था और मुझे अन्दर जाते हुए खुद अजीब लग रहा था. जैसे-तैसे अन्दर गया. अपने ही बिस्तर पर पराये कि तरह होले से बैठा. इससे पहले कि मैं कुछ पूछता मेरी श्रीमती जी की आवाज़ मेरे कानों में आती है “आपने फेसबुक पर जवाब क्यों नहीं दिया”. मैं सन्न रह गया कि ये फेसबुक कहाँ से आ गया. मैंने पूछा “क्या हमने कभी फेसबुक पर बात की है”. माफ़ कीजियेगा मैंने अभी तक आपको मेरी श्रीमती जी का नाम नहीं बताया. मेरी श्रीमती का नाम सुरभि है. तब सुरभि ने बताया हाँ. अब तो मैं और भी सन्ना रह गया. गिनती के 7 मित्रों में 2 लड़कियां थी एक 5 लड़के. और उन दोनों में कोई भी सुरभि नाम का नहीं कोई नहीं था. मैंने बिना बोले सर हिला कर ना में जवाब दिया. सुरभि की आवाज़ में मेरे से ज्यादा आत्मविश्वास था. उसने उसी आत्मविश्वास से बोला सारिका को जानते थे? मैं हक्का बक्का रह गया! मैंने कहा तू...तू...तू...तुम! सारिका. सुरुचि ने बोला ह..ह..ह..हाँ मैं सारिका. सारिका मेरे घर का नाम है. और उसी के नाम से मैंने वो आईडी बनायीं थी.

फिर मैंने एक लम्बी साँस ली और पूछा तुमने मुझे कैसे पहचाना. सारिका उर्फ़ सुरभि ने बोला कि फोटो मैंने नहीं लगायी थी पर तुमने तो लगायी थी ना वो पासपोर्ट साइज़. फिर हम दोनों के सामने वो सारे लम्हे जी उठे जो हमने एक साथ बांटे थे. 


@csahab 
www.twitter.com/csahab 

Thursday, October 4, 2012

मेट्रो में लद्दाख का अनुभव


मेट्रो में लद्दाख का अनुभव 

लद्दाख के बारे में मुझे सबसे पहले जो याद आता है वो है बेहतरीन नज़ारा, जो सिर्फ टीवी में देखा है. लद्दाख मुझे शुरू से ही अच्छा लगता है. पर दूर इतना है पूछो मत. आज़ादी से पहले जब आज़ादी के आन्दोलन होते थे तो सबको दिल्ली में प्रदर्शन करने के लिए कहा जाता था. चूँकि तब यातायात के साधन पर्याप्त नहीं थे इसलिए किसी ने कह दिया कि दिल्ली अभी दूर हैपर शेर को सवा शेर मिलते हैं. वक्ताओं ने आन्दोलन करने वालों में इतना जोश भर दिया और "दिल्ली अभी दूर है" का नारा "दिल्ली अब दूर नहीं" में बदल गया. इस नारे को बदलने में कितना समय लगा ये तो पता नहीं पर लद्दाख भी दूर है का नारा मेरे लिए पिछले कई वर्षों से नहीं बदला.

सुना है लद्दाख घूमने के लिहाज़ से बहुत कि उत्तम जगह है. हर साल देश के कोने कोने से बहुत सारे लोग साल लद्दाख जाते हैं. कुछ कार से जाते हैं से कुछ मोटरसाइकिल से. वैसे लद्दाख जाने का मज़ा जो बाईक से है वो शायद से किसी और चीज़ से होता है. मेरे कई जानने वाले हैं जो लगभग हर साल लद्दाख जाते हैं. वो भी मुझे अक्सर बोलते हैं चल यार एक बार तो चलो. पर हाय रे किस्मत! मैं कभी ना जा सका उनके साथ.

सिर्फ टीवी पर देख देख कर मन को शांत करता हूँ. पर ये कसक मेरे दिल में पिछले कई साल से साँस ले रही है और हर बार लगता है की कहीं ये आखिरी साँस ना हो. ना जाने कितनी बार झटके दे दे कर इसको जिंदा किया है. उसके बाद हर बार बोलता हूँ आल इज़ वेल. और अगली बार के लिए टरका देता हूँ. मेरी इन सारी तमाम परेशानी को शायद कोई सुन रहा था, शायद कोई अपना!

जब से मेट्रो चली है और मेरी कार्यस्थल गुडगाँव हुआ है मैंने लद्दाख को मिस करना लगभग छोर सा दिया है. सुबह ऑफिस जाने की चिंता में रात में सो नहीं पाता, और सुबह उठते ही फिर से नींद हमला कर देती है. मुझे तो लगता है नींद भी ब्लैक होल से कम नहीं है जैसे ब्लैक होल में जो जाता है वापस नहीं आता वैसे नींद के साथ है. आप जितना सो नींद उतनी ही आती है. ये नहीं की चलो 6-7घंटे हो गए तो मत आओ. पर नींद के साथ ऐसा  नहीं है. लगता है जितना सो उतना कम है.

उसके बाद घर से निकलने तक सारे काम मल्टीटास्किंग बन के करना पड़ता है. २-२ काम एक साथ. उसके बाद भागो, मेट्रो को पकड़ने के लिए. आदमी पैदल भी चलता है तो कुछ ना कुछ करता ही रहता है. उसके बाद संघर्ष करो मेट्रो में चढ़ने के लिए. जैसे लद्दाख की किसी पहाड़ी पर चढ़ा जाता है. लाइन में लगते लगते मेट्रो में एंट्री के लिए मेट्रो कार्ड लगाओ तो पता चलता रीचार्ज खतम हो गया, अब फिर भागो बाहर और फिर भाग कर अंदर आओ.


फिर भागते भागते प्लेटफार्म पर जाओ और ठीक उसी जगह खड़े हो जहाँ गेट खुलता है और जैसे ही उतरने वाले उतर जाएँ वैसे ही चढ़ जाओ. वरना सबसे आखिर तक इंतज़ार करो और गेट बंद होने से पहले थोड़ी सी बची जगह में एडजस्ट करो. और हांफते हांफते मेट्रो के इस सफ़र का अनद लो क्योंकि मेट्रो में भी लाद्द्ख की तरह oxygen की कमी है.    



Friday, August 5, 2011

भरी मेट्रो में जेब खाली


मेट्रो में आजकल भीड़ ऐसे बढ़ रही है जैसे रेलवे स्टेशन में चूहे. हर कोई मेट्रो से ही जाने की जिद करता है. दिल्ली तो छोडिये बाहर का भी कोई दिल्ली आता है तो सबसे पहले मेट्रो का ही जिक्र करता है. मेट्रो है भी शानदार नए चमचमाते डिब्बे, एसी का आनंद, कम किराया और बस से जल्दी पंहुचाने की गारंटी. आप अगर एक बार दिन में मेट्रो मैं बैठ गए, फिर आप भी मेट्रो के दीवानों की लिस्ट में आ जायेंगे.

पर मेट्रो का असली हाल जानना हो तो, जो रोज सफर करते हैं उनसे जानिए. मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूँ जो दिल्ली के एक छोर से दूसरे छोर की यात्रा करते हैं. उन्हें मेट्रो से जाना पसंद है क्योंकि बिना पसीना बहाये वो अपने ऑफिस या घर पहुच जाते हैं. और अगर माने तो एक फायदा और भी है, अगर आप लेट हो गए तो सारा का सारा ठिकरा फोड़ दीजिए मेट्रो पर. सबसे पहले यह कि जिस स्टेशन से में मेट्रो में चढ़ता हूँ, वहां की चेकिंग मशीन खराब थी तो सारी की सारी पुलिस अपने नाजुक-नाजुक हाथों से एक-एक व्यक्ति को चेक कर रही थी. इस चक्कर में भीढ़ इतनी हो गयी की गेट से १ किलोमीटर से थोड़ा कम लंबी लाइन लग गयी. यह तो था एक दिन का बहाना दूसरे दिन आप कह सकतें हैं की आज मेट्रो ही धीरे धीरे चल रही थी. अब आपके बॉस मेट्रो को तो कुछ कह नहीं सकते साथ में वो यह भी जोड़ देंगे की हाँ मैंने देखा था एक मेट्रो स्टेशन पर सच में भीढ़ थी. तो आप तो बच गए.

पर वो लोग नहीं बच पाए जो कई महीनों से मेट्रो में लगे हुए थे साफ़ सफाई के लिए. आखिर उन्हें पुलिस ने पकड़ ही लिया. मेट्रो में भीढ़ बढ़ने से कुछ विशेष व्यवसाय को बढ़ा धक्का लगा है. मैंने कई बार देखता हूँ की रेडलाइट पर सामान बेचने वाले भी मेट्रो का जबरदस्त इस्तेमाल करते हैं. वो किताब, कार स्टीरिंग पर लगने वाली ग्रिप और बहुत कुछ के साथ बड़े आराम से गुड़गांव और दूर-दूर तक ले जाते हैं और रोजाना सफर करते हैं. मेट्रो से जिस धंधे को सबसे ज्यादा चोट लगी है, वो है पॉकेटमारने के बिजनेस को. क्योंकि अब लोग ज्यादा से ज्यादा मेट्रो में सफर करते हैं और मेट्रो में लगभग हर जगह कैमरे लगे हुए हैं तो उनके लिए थोड़ा मुश्किल है. पर कहते हैं ना हर मुश्किल काम हिम्मत करने से ही आसान होता है. तो पॉकेटमारों ने भी हिम्मत करी और बनाने लगे मेट्रो को निशाना.

मुझे मेट्रो में सफर करते-करते करीब ६ महीने हो गए हैं, और इन 6 महीनों में मैंने हर हफ्ते किसी ना किसी का फोन गायब होते देखा है चूँकि में इसका भुक्तभोगी था (देखे मेरा ये अंक) तो अब मैं अपना फोन अपने हाथ में ही ले कर मेट्रो के कोच अंदर जाता हूँ. पर राजीव चौक, सेंट्रल सैकेट्रीएट स्टेशन ऐसे हैं जहां इतनी भीढ़ होती है की हर किसी को मुंबई की लोकल ट्रेन याद  आ जाती है. पर कुछ किया नहीं जा सकता है. मतलब आप मान सकते हैं की तकरीबन  50 फोन से ज्यादा हर रोज मेट्रो से चोरी किये जाते होंगे और मेरे ख्याल से सिर्फ 10या20 की ही FIR  दर्ज होती होगी.
हालाँकि मेट्रो के स्टाफ ने अभी कुछ दिन पहले तकरीबन 30 लोगों को मेट्रो में चोरी करने के लिए पकड़ा. जिसमे अधिकतर महिलाएं थी. सबसे ज्यादा फोन मेट्रो में चढ़ते और उतरते वक्त गायब होते हैं ऐसा मैंने देखा है. यही वो वक्त है जब आपको सबसे सतर्क रहना है पर हम तो ऐसे ही हैं के तर्क पर हम जमे रहते हैं और अपनी जेब खाली करते हैं भरी हुई मेट्रो मैं सवारी करते हैं.

Thursday, September 23, 2010

बस में भीड़ और विज्ञापन का असर साथ में कॉमन वेल्थ फ्री




आज कल जिधर देखो खुदा ही खुदा है, मैं दिल्ली के रास्तों की बात कर रहा हूँ । आप जिधर देख लो हर तरफ खुदा है और उसमे पानी भरा हुआ है और साथ में वो मच्छर प्रजनन स्थल बने हैं । और उन्हें मीडिया बड़ी ही तन्मंता के साथ दिखा रहा है । मैं भी कभी कभी मान बहलाने के लिए इंडिया टीवी देख लेता हूँ और मीडिया की हरकतों पर  मुस्कुरा लेता हूँ । पर क्या करे अगर, अगर क्या इतना पानी है की मगर भी रह जाये तो किसी को पता नहीं चलेगा । कोई भी दिल्ली वासी का पेट तब तक नहीं भरता होगा जब तक वो कॉमन वेल्थ वालों के खानदान को अपनी जवाब पर ना लाता हो । घर का पानी ना आये तो कॉमन वेल्थ की बीप बीप, पंचर भी होता है तो मैं कईओं को कॉमन वेल्थ की बीप बीप करते देखा है । अरे भाई उसमे वेल्थ वालों की क्या गलती वो तो बस अपना काम कर रहे हैं । आजकल हर जगह कॉमन वेल्थ की ही चर्चा है । मेरा एक रिश्तेदार भी इसका हिस्सा है और वो बड़ा प्रसन्न है क्योंकि उसे उपर से नीचे तक रीबोक के बस्त्रों से सजाया गया है ।

मेरा भी पाला कॉमन वेल्थ से होने वाली परेशानिओं से पड़ा है क्योंकि में बस का नियमित सवारी हूँ और कॉमन वेल्थ की वजह से मुझे भी या मेरे जैसे कई नियमित लोगों को परेशानी हुई है । मसलन कभी एक नया रूट बना देना कभी किसी नए रास्ते पे ले जाना । देर से ऑफिस पहुचों तो रोज नई बात बताने से ऑफिस वालों का भी शक होना की बालक रोज लेट होता है और कहानी भी नई बनाता है या तो ये बहुत क्रिएटिव है या बहुत ही बड़ा कहानीकार । पर सच तो ये है की सच वही जनता है जो बस का सफर करते हैं, हमारी पीड़ा वो क्या जाने जो खुद के वाहन या कार से आते हैं ।

वो तो जहाँ खड़े हो जाये वंही पर एफम ऑन और फोन पे लगे बतियाने । पर बस वाले क्या करे एक तो बस में भीड़ उस पर से खड़े खड़े सफर और अगर बस में आप अपने पैसे खर्च कर के भी बात करेंगे तो भी कई लोग टोक देते हैं की भाई साहब बस में तो अराम करने दिया करो फिर तो दिन भर फोन पर ही बात करना है । ये हैं बस के हालात । कुछ लड़किओं को मैंने देखा है उनके मुंह में साईंलेंसर लगा होता है कितना भी ध्यान लगा लीजिए मजाल की आप उनकी बात सुन सके ।

अब कल की ही बात है सुबह का समय था हर कोई भागने में, और बस पकड़ने में लगा हुआ था । मैं भी भीढ़ का एक हिस्सा था । बरसात का ये किस्सा था । जब से बस में फोन चोरी हुआ तब से ब्लूलाइन की सवारी से बचता हूँ, थोड़ा अराम से बस पकड़ता हूँ । एक सरकारी गाडी आई वो भी पूरी ठसाठस भरी हुई । किसी तरह उसकी बालकॉनी वाली सीट ( ड्राईवर के बगल वाली क्योंकि यही वो स्थान है जिसे पूरी बस दिखाई देती है तभी में इसे बालकॉनी वाली सीट बोलता हूँ ) पर जगह मिली । और मैं ड्राईवर साब से बाते करता हुआ सफर को अंजाम देने लगा । अभी बस अपनी रफ़्तार पर थी की अचानक किसी महिला के शोर की आवाज़ आई, आवाज़ का जब ठीक से अध्ययन किया तो पता चला की कोई नवयुवती होगी । उसके साथ उसका कोई पुरुष मित्र भी था । उसके बाद तो अगले १५ मिनट तक सिर्फ हो हल्ला ही होता रहा बात क्या थी पल्ले ही नहीं पड़ रही थी । हम भी ड्राईवर साब के साथ मगन थे । एक जनाब जब पीछे से आगे तो मैं बड़े प्रेम से पूछा क्या मैटर था, तो जनाब बोले भाईसाब बस में इतनी भीढ़ है  गलती से किसी ने एक नवयुवती को छू दिया होगा तो उस पर उनके पुरुष मित्र तो ताव आ गया । तो पूरा मुद्दा मेरे समझ में आ गया । वैसे भी आज कल रेडियो और टीवी में नया विज्ञापन बड़ा चल रहा है की वो प्यार ही क्या जो आपकी रक्षा ना कर सके गुनाहों का देवता । चलो कम से कम विज्ञापन का असर इतनी तेज़ी से होता है ये मैंने बहुत दिनों के बाद देखा था । मैं भी अपने स्टॉप से ऑफिस के लिए निकाल पड़ा ।   

Wednesday, September 1, 2010

अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

आप कभी कभी चाह कर भी कुछ नहीं लिख सकते क्योंकी आपका मन नहीं लगता है । कुछ करने में बहुत कुछ सितम सेहना है । इतने दिनों से ब्लॉग से दूर हूँ पर सच मानिये मन से नहीं तन से मजबूर हूँ ।  दिल हमेशा सही कहता है ये हर शायर कहता है । वैज्ञानिक दिल छोड कर दिमाग की बात मानने को कहता है । पर हमारे के पास दोनों रहता है । वक्त के साथ दोनों की बात मानते है और दिल बच्चा है कह कर दिल और दिमाग को शांत करते है ।

बात पिछले रविवार की है बहुत दिनों के बाद बाइक की सवारी लेने का मौका लगा  क्योंकि उस दिन रविवार था । पर अकेले जाना का सुख हमें नहीं प्राप्त नहीं था नाना जी साथ मेरे साथ था । वर्ष उनके ८० है शुद्ध दही की बनी लस्सी है । चम्मच से खाने जितने गाढ़े हैं तभी तो आज भी सबके प्यारे हैं । उनको ले कर कम से कम २०० किलोमीटर की यात्रा करनी थी । वो भी बस दिल्ली के अंदर करनी थी । माथा मेरा सुबह से खराब था थोड़े रास्तों से में अनजान था । मैंने भी हेलमेट सर में लगाया एक कनटोपा नाना जी को भी थमाया । नाना जी देख कर चौके, मैं कहा पहनो नहीं तो किसी और को पकड़ो । फिर दोनों का काफिला चल पड़ा हर गड्ढे के बाद नाना के मुह से मारा गया राम फूट पड़ा । कॉमन वेल्थ के चक्कर में नाना जी का हेल्थ डोल गया पूरा बुढा  शरीर झोल गया । हमने अपनी यात्रा फिर भी ना रोकी और काफिला फिर भी चलता गया । रास्ते में कुछ अजीब अजीब प्राणी से मुलाकात हुई । हालाँकि उनसे मुलाकात २० सेकंड से ज्यादा नहीं थी । पर वो कुछ दिल और दिमाग में छाप छोड गए । मैंने एक ठेठ हरयाणवी से पता पूछा उसने साथ में ४-५ और बता दिए- तू ऐसा कर सिद्धे चला जा आगे से मोड पे शर्मा जी मकान अयेगा उसे बाद अपने भतीजे का फिर एक का और आयेगा तू उसके बाद की रोड पे मुड जाना और फिर किसी से पूछ लेना । मुझे इतना गुस्सा आया गुस्सा पी के मैंने सारा गुस्सा गति बढ़ा कर निकाला । आगे एक रिक्शे वाले से पता पूछने का ख्याल दिल में आया बाद में उस ख्याल पर बहुत से जातिवाचक शब्दों से उसका अंत करवाया- भैया ये फलां पता बताओगे । उसके अंदर कस्टो मुखर्जी का साया पाया । ये पता तो मुझे मालूम है क्या तुमको यंही जाना है पर क्यों जाना है क्या बाइक से जाना है तुम दोनों  को जाना है । उसके आगे सुनने से पहले में कुछ और नहीं सुन पाया और गाड़ी को आगे बढाया । जिनके वहाँ जाना था उन्ही को फोन मिलाया तब जा कर सही पता पाया । उनके मिलने के बाद मैं कंही और जाने का प्लान बनाया पर नाना जी का प्लान पहले से बना था जो उन्होंने मुझे सुनाया । मैंने भी आज खुद को पक्का भक्त बनने का ख्याब सजाया और नाना जी को बैठा कर फिर वाहन को द्रुत गति से दौड़ाया । आगे फिर रास्ता पूछने का दुस्साहस दोहराया ।
बाद में फिर यही सोचा की मुझे आज ऐसा ख्याल फिर क्यों आया । जनाब को किसी चीज़ की जल्दी नहीं थी उल्टे हमें राय देने में अपना समय बिताया । आपका जहाँ जाना है वो जगह यहाँ से दूर है एक बार और सोच लीजिए । मैंने कहा अब निकल गया हू तो जाना ही है कितने किलोमीटर होगी । २ मिनट मंथन से बाद ५ किलोमीटर मुह से निकला और जाने का सबसे लम्बा रास्ता बताया । गंतव्य स्थल पर जैसे तैसे पंहुचा पर उन सबका आभार व्यक्त करने से डरता हूँ आज बस इतना ही लिखता हूँ । 

Friday, June 25, 2010

बड़े दिनों के बाद एक बार फिर ब्लॉगर के साथ

आज एक बार फिर इतने दिनों के बाद आपके सामने कुछ लिखे का मन हुआ है । पिछले लगभग एक महीने से कुछ ज्यादा ही व्यस्त था जिसके कारण में ब्लॉग में एक भी एंट्री नहीं लिख सका । इसके पीछे कुछ कारण थे । कुछ तो अपने काम में व्यस्त होना अर्थात ऑफिस में थोडा अधिक काम था । और जब उससे कुछ फ्री हुआ तो मेरे पिता श्री जिन्हें सभी जानने वाले चाहे वो छोटे हो या बड़े दददू कहते थे उनका अचानक देहांत हो गया जिसने मुझे पूरी तरह से पंगु बना दिया । आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखे बैठा हू । पर ये समझ नहीं आ रहा है क्या लिखू । यात्रा का विवरण लिखू या क्या । जब दददू के बारे में पता चला तो पूरा का पूरा स्तब्ध रह गया । खैर मृत्यु एक ध्रुव सत्य है  जिसे में क्या बाबा राम देव भी नहीं टाल सकते । उसके बाद पुनः दिल्ली आने के बाद फिर काम में ऐसा रमा की लिखें की आशा आस लगाये बैठी थी की कब में आस से उठ कर बैठू और लिखना शुरू करू ।

आपको बाता दू इतने दिनों से ना लिखने के कारण बहुत सी कहानिया मेरे दिमाग के समुन्द्र में गोते लगा रही  है पर उनको मैं चुन नहीं पा रहा हूँ । यही सोच कर अब में ओक्सीजन लगा कर उस गहरे समुन्द्र में उतरने की तयारी कर चुका हूँ और ये सोच कर बैठा हू की आज समुन्द्र से कोई भी मछली ना पकडूँगा बल्कि सिर्फ उन्हें चारा दे कर आ जाऊंगा ताकि कल से वो रोज मेरे लिए किनारे पर आये और मुझे नित नयी बात याद आये ।

इतने दिनों में क्या क्या नहीं बदला किसी देश का प्रधानमंत्री , वर्ल्ड कप के महारथी , भारत का क्रिकेट इतिहास तो फिर मेरी बस क्यों ना बदलती । मैंने भी अपनी बस बदल ली थी । अब मैं नए रूट और नए बस की सवारिओं के साथ आता हूँ । कहते है परिवर्तन जीवन के लिए अच्छा होता है।

मेरे साथ भी कुछ कुछ अच्छा रहा । बस का माहौल अच्छा था । ऑफिस पहुचने में पुरे २५ मिनट की बचत होती थी । जिसके कारण अब में आराम से ३० मिनट ज्यादा सोता था । मेरी भाभी को ३० जायदा सोने की भी आजादी मिल गयी । अलबत्ता मेरे भतीजे जनाब अब वक्त से १ घंटे पहले सो कर उठ जाते है । जिसका नुक्सान मुझ जैसे गरीब को उठाना पड़ता है । पर उसके साथ थोड़ी देर खेल कर उस १ घंटे के नुकसान से बाबा रामदेव की कसरत के समान उर्जा शरीर आती हुई लगती है । सरे अंग भलीभांति चलते हुए लगते है । वैसे बस में रोज ना रोज कुछ ना कुछ ऐसा वैसा अजीबो गरीब द्रश्य परिद्रश्य नज़र वजर आ ही जाते है । जिनका मैं कल से जिक्र करना शुरू कर दूँगा । पर इतना तो जरूर है की पुराने रूट और नए रूट में बहुत अन्तर है । पुँराने रूट में जन्हा नित नए स्ट्रैंड पर कुछ ना कुछ होता रहता था यंह पर स्टैंड नियत है जिन पर घटनाये भी नियत है । पर जो जो होता है वो भी कम रोमांच पैदा नहीं करता ।