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Tuesday, October 26, 2010

गंगा मैली यमुना मैली पर इंसानों के मन है चंगे

बहुत पहले की एक कहावत है की मन चंगा तो कठौती में गंगा । तब जब इसे कहा गया था तब शायद या तो यमुना का अस्तिव नहीं रहा होगा या फिर शायद उसमे कोई नहाता नहीं होगा । या एक कारण और होगा वो है की वो पाप नहीं धोती होगी । पर आज तो क्या गंगा क्या यमुना दोनों ही सिर्फ कपड़े धोने के काम में लायी जाती है । खास कर बड़े बड़े शहरों में चाहे वो कानपुर हो दिल्ली । उनकी हालत दोनों जगह बिगड़ी है ।

सरकार ने दोनों को साफ़ करने के नाम पर न जाने कितने करोड़ो रुपये पानी के नाम पे पानी की तरह बहा दिया । और वो पैसे अपनी की तरह बहते ही रहे पर फिर भी गंगा मैली यमुना मैली की मैली ही रही । कितने स्वयंसेवकों न इसी बहाने अपने वारेन्यारे कर लिए । शायद अब वो उस गंगा किनारे भी नहीं जाते होंगे जहाँ से उन्होंने शुरुवात की होगी । बस सफाई के नाम पर करोड़ो अंदर करने में खुद मैले हो गए पर गंगा साफ़ न हुई ।

कभी कभी लगता है की न जाने क्या सोच कर रीती रिवाज़ बनाये गए होंगे की घर की पूजा का सारा सामान अगर आप गंगा में डालेंगे तो पुण्य मिलेगा उनका मतलब शायद पोलिथिन से नहीं होगा । क्योंकि उस समय ये सुविधा उपलब्ध नहीं रही होगी अगर होती तो आज के नियम भी कुछ और होते । तब शायद गंगा का नाम भागीरथ हो रहता और वो आज इतनी पवित्र नहीं मणि जाती और न ही यमुना । हालाँकि गंगा को सबसे सबसे पवित्र नदी मन जाता है और पुरे भारत वर्ष में सबसे ज्यादा मान मिलता है । गंगा पर ना जाने कितनी फ़िल्में बनी हिट हुई और लाखों कमाएँ । पर गंगा को क्या मिला तारीख पर तारीख । हर साल गंगा को सफाई के लिए नई तारीखे मिलती है चाहे वो कोर्ट हो या मंत्रीमंडल या फिर श्रद्धालुओं के मन में गंगा सफाई के प्रति पूर्ण आस । एक बार जोश के साथ गंगा की कुछ घाटों की सफाई होती है साथ में एक गंगा आरती का गाना बनता है, योग बाबा थोडा भाषण देते हैं ताली बजती है थोडा साफ़ होता है 2-3 तक अखबार में सुर्ख्रियाँ बनती है और फिर वही पुनः मुश्को भवः वाली बात होती है । इतना कुछ होता है पर गंगा या यमुना साफ़ नहीं होती साफ़ होती है तो बस सरकार के जेब से मुद्रा, अखबारों से स्याही और व्यर्थ में किया गया श्रम । जिसके लिए खुद गंगा और यमुना अगर बोलती तो वो भी मना कर देती ।

बात ये है की एक और कहावत कही गई है की दान की शुरुवात घर से की जाती है तो मेरा मानना है की गंगा और यमुना की सफाई भी घर से शुरु करें । कम से कम पोलिथिन तो नदिओं या नालों में न फेंके और साथ ही घर में पेड़ पढ़ो की संख्या बढ़ाये या नये लगाये जिससे घर में निकलने वाला निर्वाल (पूजा पर चढ़े फूल ) उनमे डाले जा सके जिससे पेड़ के साथ साथ फूलों को भी समुचित विकास मिलेगा और हमें बेहतर घर । साथ ही मेरा पूजा के सामान बनाने वालों से अनुरोध है की सामानों पर भगवानों के चित्रों से बचे जिससे पूजा के बाद उन्हें कंही भी रखा और किसी को भी दिया जा सके । कुछ इसी तरह के नये ख्यालों से सरकार से द्वारा दिया गया हमारा ही धन गंगा की सफाई के साथ साथ न जाने कितने सुखाग्रस्त जगहों की प्यास बुझा सकता है । मैं अपने बस की यात्रा के दौरान देखता हूँ की पुल पर  से लोग न जाने क्या क्या फेकते रहते है जिनकी मदद के लिए बकायदा सरकार ने पुल की रेलिंग पर बने जालों को
कटवा रखा है जिससे सरकार के लिए किसी तरह की धार्मिक परेशानी न हो ।

विशेष : उपर जो भी लिखा है वो व्यक्तिगत राय और सुझाव है । पाठकों का सहयोग सम्मानीय है । 

Saturday, August 7, 2010

सुबह सुबह शिव के दर्शन, चलती बस में कीर्तन

क्या सोचू क्या लिखू  कभी कभी खुद से यही पूछता हूँ । खुद से कभी कभी । जवाब वही आता है जो लिखें वाला हूँ चुप चाप जो मन में आये लिखे जायदा पका मत
सच में यही वो ख्याल है जब में थोडा ज्यादा ही सोचने लगता हूँ । तो प्रयास कम ही करता हूँ । मैं अपनी रोज ही जिंदगी रोज जी रहा हूँ । रोज कुआँ खोदता हूँ रोज पानी पीता हूँ । क्या मज़े है अपनी पीने का ।

यही सोचता हुआ ऑफिस के लिए रोज घर से निकलता हूँ ।वही बस में पुराने चेहरे , वही टिकेट काटने वाला वही गाते पर खड़े रहने वाला , वही बस की सबसे आगे की सीटों पर रोज बैठने वाली महिलाये(कुछ बालिकाएँ भी) वही रोड वही रास्ते । सोचता हूँ कब तक यूँ ही चलता जाऊंगा, कब जा कर विराम पाउँगा । इस रोज रोज झान्जह्त से कब में मुक्त हो पाउँगा ।

नित कुछ नया करने के उद्देश्य से नेट पर मेल चेक करता हूँ और कुछ नया ना पा कर फिर काम में लग जाता हूँ । काम का भी वही हाल है , मेरे से बुरा उसका हाल है । वो भी मेरे पास आ आ कर थक गया है उसे भी किसी और की दरकार है । बिना बात के काम है काम के काम है उसके बाद थोडा आराम है । पर कभी कभी उस आराम में भी थोडा काम है । और तो और आराम भी एक काम है ।

यही सोचता हूँ और काम कम आराम ज्यादा करता हूँ । चलो थोड़ी बस की बात हो जाये । बात थोड़ी पुरानी है बस में खड़े खड़े सफर कर रहा था की तभी कीर्तन की आवाज़ आई हरे कृष्णा हरे राम राम राम कुछ ऐसा ही था । मुझे ध्यान आया की यार रास्ते में तो ऐसा कोई मंदिर है नहीं जहाँ के भक्त इतने बहकती करने वाले हों । तभी बगल से सरकारी बस का द्रश्य साक्षात् दर्शन हुए और सारे के सारे ख्याल हकिकत में बदल गए । बस के पीछे वाली सीटों पर पूरी की पूरी कीर्तन मंडली बैठी थी । मेरे ख्याल से सरे के सारे एक ही ऑफिस के या एक ही कॉलोनी के रहे होंगे । वो पूरी तरह से तैयार खिलाड़ी लग रहे थे । क्योंकि वो ढोलक , मंजीरे और करताल से सुसज्जित थे । पूरी बस उस कीर्तन का आनंद ले रही थी । और सुनने वाले भी या कहे तो साथ चलने वाले भी । पर बस के अंदर या ये द्रश्य देखें में बड़ा ही अजीब लग रहा था पर आँखों और कानों  को उनके कीर्तन सुकून बड़े दे रहे थे । और अंदर से एक ही पुकार आ रही थी की चलो कम से कम दिल्ली जैसे शहर में ऐसा नज़ारा देखा जहाँ पर शायद दर्शन उनके दुर्लभ होते हैं जैसे दिल्ली में हैंडपंप । दुर्लभ से मेरा मतलब मंदिर से नहीं इंसानियत से है । मुझे उन भक्त जानो पर बहुत ही जायदा खुशी हुई की कैसे उन्होंने समय का सदुपयोग किया । आज कल के समय में हमें पूजा पाठ करने का टाइम नहीं होता । मैं बस से देखता हूँ की बहुत लोग कार के अंदर ही पूजा करते हैं । जूते उतार कर कार में ही हनुमान चालीसा या जो भी उनके इष्ट देव हो उनको याद कर लेते हैं । बड़े शहर में हर कोई समय का सदुपयोग करने में लगा है । कोई अखबार ले कर ही सुबह शौचालय में चला जाता है पूछो तो कहता है यार अंदर क्या करूँगा इसी बहाने अखबार भी पढ़ लूँगा। समय भी बचेगा मुझे ये समझ में नहीं अत है की एक साथ दो काम कैसे कर लेते हैं लोग वो भी निहांत एकाग्रता वाली जगह पर जन्हा पर कोई आवाज़ भी दे दे तो पूरी की पूरी मेहनत बेकार हो जाटी है । और नए सिरे से प्रयास करने होते है । अरे क्षमा चौंगा की बस की बात से पता नहीं कहाँ खस पे चला गया ।