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Tuesday, April 6, 2010

खाली सीट का चक्कर और मैं

आजकल मेरे दिन और शाम दोनों बड़े अच्छे जा रह है । कारण अज्ञात है । मैं खुद ये जानने की कोशिश कर रहा हू हू आज कल मेरे साथ ऐसा क्या हो रहा है की मेरे साथ कुछ भी नया नहीं हो रहा । अब कल की ही बात है जब ऑफिस से घर जाने लगा तो देखा अभी तो रोशनी ही है मतलब आज फिर में ऑफिस से जल्दी घर जा रहा हूँ । इतनी जल्दी शायद ही मैं कभी ऑफिस से घर गया हू । चलो कोई नहीं कभी कभी ऐसा  होता है । थोड़ी थोड़ी धूप का असर अभी भी था गर्मी मुझे बाहर आने पर ही लगने लगी थी । सड़क पर धुल उड़ रही थी । इन सबको देख कर मुझे भी कुछ ज्यादा गर्मी का एहसास होने लगा । पर में इन सब को साथ ले कर आने स्टैंड की तरफ चल रहा था । तभी मेरी नज़र सड़क पर कड़ी कुछ लड़कियों पर गयी वो जिस तरह से चीख चीख कर अपने कपड़ो के विषय में बात कर रही थी वो सभी आने जाने वालों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी । पर उनको इनकी कोई परवाह नहीं थी क्योंकि वो अपने कपड़ो की परिचर्चा मैं व्यस्त थी । सबसे मजेदार बात तो ये थी की दोनों ग्रुप रोड के दोनों तरफ से बात कर रहा था और बात कुछ इस प्रकार थी की फलां टॉप किस रंग का लिया था मैंने तो इस रंग का लिया था वो कई जगह से ढिला था कुछ इससे भी आगे की बात थी जो में नहीं कह सकता । पर मेरे दिमाग में अभी भी घूम रही है । पर इससे उनको कोई असर नहीं था । पर उनकी बातों से ये तो पता चल गया की लड़किया कपडे खरीदते वक्त क्या क्या देखती है । और मेरे साथ क्यों और लोगो को भी ये बात परा चल गयी होगी । चलो चलती का नाम गाड़ी जो रुक गया वो अनाडी यही सोच कर में भी अपने स्टैंड की ओर चल पड़ा । आज बस स्टैंड का नजारा थोडा अलग था आज सभी उम्र के लोग बस के इंतज़ार में खड़े थे । और मुझे आज पता चला की इस वक्त अगर बस में चढ़ना  है को मुझे मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी । मुझे बस का भी इंतज़ार ज्यादा नही करना पड़ा १० मिनट में बस भी स्टैंड पर खड़ी थी और में बस के अंदर थे । अब आप समझ ही गए होंगे की में अंदर किस तरह पंहुचा जिसको लिखना थोडा मुश्किल है । बाकी आप खुद समझदार है । में बस के अंदर था और बस चल पड़ी अब नयी मेहनत करो सीट के लिए ।  मैंने अपनी वाक् द्रष्टि डाली तो आभास हुआ की अगले १५ मिनट में सीट मिलने की उम्मीद की जा सकती है । ये सोच कर में एक संभावित सीट के बगल में खड़ा हुआ की देखा जन्हा में पहले खड़ा था उसके बगल की सीट खाली  हो गयी । मैंने कहा कोई नहीं बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी छोटी बातें होती रहती है । मेरा शिकार या यूँ कहे की मेरी सीट अब तक भरी थी । में बेसब्री के साथ उसके खली होने के इंतज़ार कर रह आता । मैंने देखा एक जनाब हिलने डुलने लगे मुझे लगा अब ये सीट खाली करने वाले है में लपक कर उनके बगल में खड़ा हो गया । पर ये क्या ये तो धोखा हो गया वो जबान तो नहीं उठे पर जन्हा में पहले खड़ा था अलबत्ता वो जरूर खली हो गयी । अब मुझे थोडा थोडा गुस्सा आने लगा था । मैं अभी भी संभावित सीट के चक्कर में परेशान था । मैंने देखा एक सीट खली हुई मैं फिर सीट की और लपका पर पुनः टपक गया और सीट मिस कर दी । अब में समझ गया की जो बात घरवाले समझा  रहे थे और वो बात मेरे समझ में अब तक नहीं ई थी पर बस ने उसे समझा दी की सब्र का फल मीठा होता है । और मुझे कंही एक जगह खड़े हो कर सब्र से सीट की तलाश करनी चाहिए । मैंने अब यही करने का प्रयास किया किया और परिणाम सामने था मेरे स्टैंड से एक पहले मुझे सीट मिल गयी । मैं सफल हुआ और अगले स्टैंड पर उतर गया । 

Monday, April 5, 2010

वीकेंड्स और बस का मज़ा

वीकेंड का विदेशो में बड़ा चलन है मैंने सुना है की विदेशी वीकेंड्स पर शायद ही काम करते है । पर ये इंडिया है मेरे दोस्त यंह वीकेंड्स पर ज्यादा काम होता है । पर शानिवार को मेरे साथ किसी बहारी मुल्क के लोंगो जैसा ही व्यवहार किया गया ।
कोई काम नहीं ओन्ली आराम । जिसका मैंने भी खूब सुख लिया । और दोपहर तक कोई काम नहीं किया । और जिसका मुझे डर था वही हुआ मुझे नींद आने लगी । पर गनीमत ये रही की मुझे ऑफिस से छुट्टी मिल गयी । और मैं घर की तरफ चल निकला बहुत दिनों के बाद पता चला की मार्च मैं गर्मी का मतलब क्या होता है और क्यों और कैसे ठंडा मतलब कोका कोला(काला) बना प्रसून जोशी भी इसे किसी गर्मी के शिकार हुए होंगे जब उन्हें ये शब्द याद आये होंगे । और बहुत दिनों के बाद ऑफिस के  ऐसी को मिस किया । चलो कोई नहीं घर जाने की खुशी थी की चलो आज तो जल्दी घर जा रहा हूँ । शायद इसका पता सबको चल गया था तभी मुझे बस बस स्टैंड से बहुत पहले मिल गयी । इसका कारण था की जिस रूट से बस रोज जाती थी उस रूट पर जाम लगा था तो बस ने अपना रूट बदल लिया और वो मेरे रूट पर आ गयी ।
उस दिन की सबसे अच्छी बात ये रही की बस का माहौल बड़ा ही मज़ेदार था । मैंने इतनी शांत इतनी सुन्दर बस कभी नहीं देखी थी या यूँ कहू की बहुत बहुत दिनों के बाद देखी थी ।क्योंकि बस पूरी तरह से खाली थी और मैं बस का एक एक हिस्सा देख सकता था । मैं अपनी टिकट ले कर बस में बैठ गया । आज बस को देख कर लगता था की बस बस के बस में बस जाऊ । जितनी सीट उतनी सवारी न कम न ज्यादा हिसाब पूरा बराबर । उसको देख कर एक कहावत याद आती है जिसे मैंने बस के अनुसार बदल दिया है जितनी सीट उतनी ही सवारी और जितने सवारी उतनी ही सीट (Every thing has place and every place has a thing ) । मेरे ख्याल में दिल्ली की बहुत से लोंगो ने ये नज़ारा नहीं देखा होगा या अगर देखा भी होगा तो ये उनके जीवन का बेहतरीन नजारों में से एक होगा । और ये सिलसिला मेरे स्टॉप तक चलता रहा सबसे अद्भुत बात तो ये रही की कभी भी बस में कोई सीट खाली नहीं हुई और न ही कोई खड़ा रहा । शायद मेरे अलावा किसी ने गौर किया होगा या नहीं मुझे नहीं पता पर में जरूर कर रहा था । मेरे अब तक के बस इतिहास में ऐसा मैंने पहली बार गौर किया होगा ।अब इसे ब्लॉग की उपज मान ले या मेरे अंतर्मन की । पर वो दिन बड़ा शानदार रहा था । और तो और जब मैं बस से उतरा तो अकेला और चड़ने वाला भी एक था । वो बस मुझे आज भी याद आती है । एक बड़ी ही मजेदार बात हुई आज सुबह हुआ ये की आज सोमवार होने के कारन बस मन बहुत भीड़ थी तो एक सज्जन महिला सीट पर बैठे थे उनके पीछे भी महिला ही सीट थी जिस पर भी एक सज्जन ही बैठे थे । किसी स्टॉप पर एक महिला बस मैं सवार हो गयी तो पीछे बैठे सज्जन ने आगे बैठे वाले सज्जन से कहा की आप महिला सीट पर बैठे है कृपया उठ जाये इस पर आगे वाले सज्जन को गुस्सा आ गया और बोले आप भी तो महिला सीट पर बैठे है आप क्यों नहीं दे देते अपनी सीट जो मुझसे कह रहे है । अब इसके बाद तो मज़ा आ गया जो बता बाती शुरू हुई और अच्छे अच्छे संवाद बोले गए उनका क्या कहना । बात बिलकुल सही थी चूँकि कोई महिला सीट पर बैठा है या तो वो स्वयं सीट दे दे उसको दूसरों को नहीं कहना चाहिए क्योंकि वो खुद गलत है । ऐसा मेरा मनना है । पर उस क्षण मैं सिर्फ सुन सका था । मैं खुद महिला सीट पर बैठने से बचता हू और अगर मजबूरीवश बैठ भी जाऊ तो सोचता हू कोई महिला बस मैं न चढ़े । ताकि मेरी सीट बची रहे । आपको तो पता है न सीट कितनी जरूरत की चीज़ है बस मैं ।