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Friday, April 23, 2010

बस में ब्लॉगर और अजीब सी उदासी

कल २ दिनों के बाद जो लिखा उससे मेरे कुछ दोस्त बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे थैंक्स लिखने ले लिए , आज पुरे दो दिनों के बाद कलम उठाई , और बहुत अच्छे जैसे कमेन्ट से मेरा उत्साह बढ़ाया । जिसने सच मैंने मुझे एक नए उत्साह का एहसास कराया है । कल ऑफिस में फिर थोडा बिजी था पर कल और आज दोनों दिन ब्लॉग लिखने का समय निकल लिया । कल ब्लॉग लिख कर बड़ी ही मस्ती के साथ ऑफिस से निकला । अंदर एक अजीब सा उत्साह था । शायद ब्लॉग लिखें कि खुशी थी या शायद कुछ और जो मैंने नहीं जनता । कल वही अपना घर जाने का समय पुराना था । रात के अँधेरे में एक बस का ब्लॉगर निकलता है जिसे लोग विपुल कहते है । वैसे मजाक मजाक मैं ये लाइन बड़ी अच्छी निकली या खराब ये तो आप ही लोग बताएँगे । खैर २ दिनों के बाद वापस स्टैंड पर एक निश्चित समय पर आना बड़ा अच्छा लगा और १-२ चेहरे पुराने लगे थोड़े नए भी आ गए थे ।पर बस स्टैंड का माहौल नहीं बदल था एक नयी चीज़ हुई थी कि चूँकि गर्मी अपने चरम पर पहुच चुकी है तो एक के बजाये दो पानी वाले जरूर खड़े हो गए । जो मेरे सामने रहते तक बिजी रहते है । उनको साँस लेने तक कि फुर्सत नहीं रहती है । मेरे ये समझ में नहीं आता ही लोग कितने प्यासे है । चलो इसी बहाने कम से कम उनका तो काम चल जाता है और रोज़ी रोटी भी । लगभग १५ मिनट खड़े होने के बाद बस का आगमन हुआ ।  मेरी नज़र उस खैनी वाले को ढूंढ  रही थी ।   वो मुझे आज नहीं दिखाई दिया । मैं बस के अंदर था और एक कोने में खड़ा हो गया था । आज अंदर से मन कुछ उखड़ा उखड़ा स लग रह आता । पता नहीं क्या चीज़ थी जो मुझे कम लग रही थी । और कुछ न होने का एहसास दिला रही थी । शायद उसका नाम मुझे नहीं पता था । में रह रह कर तडप रहा था और उसका नाम मेरे जेहन में नहीं आ रहा था । लगभग १० मिनट बाद मुझे सीट नसीब हुई पर ये खुशी भी मुझे ज्यादा देर नसीब नहीं रही और एक बुजुर्ग के आने के बाद वो उनके नसीब में स्तान्तरित हो गयी । मुझे कभी कभी बड़ा कोफ़्त होता है कि जब कोई अच्छी डील डोल वाली युवती बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में इंग्लिश के २ शब्दों में अपने उठने कि प्रार्थना करती है तो जब नारी के आगे विश्वामित्र कि नहीं चली तब तो में साधारण मानव हूँ जिसके अंदर मेरा स्वयं का दिल धक् धक् करता है । पर में किसी महिला के बजाये किसी बुजुर्ग या उम्र दराज महिला को सीट देना ज्यादा सही सोचता हूँ । और मैं खुद महिला सीट पर  बैठने से परहेज़ करता हूँ और खड़े हो कर यात्रा करना ज्यादा पसंद करता हूँ । बाकी का सफर मेरा खड़े खड़े गुजरा जिसका मुझे कतई भी गुरेज नहीं है । क्योंकि मेरे से ज्यादा बुजुर्ग को सीट कि जरूरत थी । वैसे मेरे जैसे बस में मैंने कई लोंगों को देखा है जो स्वेक्षा से अपनी सीट बुजुर्ग महिला और पुरूष के लिए छोड देते है  । तब मुझे और खुशी होती है । और कुछ लोग मुझे बस में बड़े अछे लगते है क्योंकि वो बस को संगीतमयी बना देते है । उनके नेपाली फोन में लगा बड़ा सा स्पीकर वो ऑफिस से निकलते ही आन कर देते है और पूरे रास्ते वो सबका मनोरंजन करते हुए जाते है । उनको इससे कोई मतलब नहीं कि किसी के साथ कितना चचा हुआ होगा पुरे दिन या कितना बुरा हुआ होगा वो अपनी मस्ती में चूर रहते है । इसमे मैंने कई बुजुर्गो  को भी देखा है जो बस में अपने समय के हिट गानों को सुनते है और अपनी  ही मस्ती में खोये रहते है । आज खड़े खड़े यात्रा करने में भी एक नया ही आनंद और सुख था । 

Friday, March 26, 2010

बस की एक अनोखी यात्रा

कल मैं थोडा उदास टाइप था ।  बार बार यही सोच रहा था बस मैं बैठे आधे घंटे हो गए अब तक कुछ नहीं हुआ नया नया ब्लॉग लिखना स्टार्ट किया है । मेरे ब्लॉग करियर को तो ब्लोगारिया रोग लग जायेगा । पर धन्य हो बस देवी और लोंगो का गुस्सा मेनेजमेंट । जरा सा छू दो तो तुरंत स्टार्ट हो जाते है । जैसे वो इंतज़ार ही कर रहे हो उस बात का । उनकी चाभी भरी रहती है जब वो ऑफिस से निकलते है की आज किसी ने छुआ भी तो सारी की सारी आग उनपर ही उगल दूँगा । मैं भी बड़ा प्रयास करता हू की उनकी तरह गुस्सा करू पर मैं नहीं कर पता । कल का मुद्दा ये था की एक नवयुवक बस मैं चडा वऔर लपक कर जल्दी जल्दी ड्राईवर के पास जा कर खड़ा हो गया । मुझे आज तक समझ मैं नहीं आया है की कुछ लोंगो को ड्राईवर के बगल मैं बैठ कर यात्रा करना क्यों अच्छा लगता है । जबकि मैं बहुत जगह देखा है ड्राईवर को ऐसा बिलकुल पसंद नहीं पर अगर इंसान मान गया तो वो इंसान कैसा तब तो वो भी जानवर हुआ न । अरे मैं उस नवयुवक की बात कर रहा था तो वो वहा पर खड़ा हो कर यात्रा करने लगा । अचानक ही बमका बमकी के मधुर सुर चरो तरफ़ खिलने लगे । हुआ कुच एसा था कि नवयुवक अपने से बुजुर्ग का सहारा ले लिया था । बस पूरे बस मे दोनो छा गए । छोटा बड़े को बड़ा छोटे को सम्मान की बात समझाए । और मैं उनकी बात को याद कर रहा था की कल मुझे क्या क्या लिखना है । अब तो बस में कुछ चीजे आम हो गयी है जैसे की मुझे बस थोडा थोडा पता होता है कौन सी सीट से कब कान्हा उतरेगा और कब मुझे सीट मिलेगी । कुछ तो इतने एक्सपर्ट है की पूछिए मत । पर मुझे एस बात का बड़ा अफ्सोस है की उनकी बाता बाती ज्यादा देर नहीं चली और बस मैं बस में बड़ी जल्दी ही माहौल शांत हो गया । में बड़ी अंदर से थोडा प्रसन्न और थोडा उदास था । प्रसन्न इसलिए की माहौल शांत हुआ और उदास इसलिए की मेरी कहानी अभी बाकि थी क्योंकि पता नहीं अचानक क्या हुआ दोनों एक साथ अपने आप शांत हो गए । शायद उनको मेरे लेखन के बारे मैं पता तो नहीं चला गया । खैर मेरा स्टैंड आ गया था पर उनका नहीं ।