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Tuesday, April 20, 2010

खाली बस का आनंद और राजसी सुख का एहसास

कल का दिन वैसे सभी लिहाज़ से शनिवार और रविवार से अच्छा था । कम से कम सोमवार को वो सब नहीं हुआ जो रविवार और शानिवार को हुआ था ।पूरा दिन अच्छे से गुजर गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो । कब १० बजे कब १२ और कब ५ पता ही नहीं चला । हालाँकि काम कुछ खास नहीं किया पर जो किया वो लगन के साथ किया । तो वही वाली बात याद आ गयी की समय बितते देर नहीं लगती । कुछ ऐसा ही सोमवार को हुआ था । मैं भी सोमवार के खतम होने का इन्तजार करने की इच्छा नहीं हुई वो तो अपने आप ही तेजी से खतम हो गया । और मेरे जाने का समय नजदीक आ गया व् कल मेरे एक और मजेदार बात हुई कल मेरे ऑफिस में सबको पता चल गया की मैं एक ब्लॉग का मालिक हूँ । क्योंकि जब में कल का ब्लॉग लिखने में मग्न था तब भी न जाने कब मेरे बॉस मेरे पीछे आ कर विराजमान हो गए पता नहीं चला । और जब तक पता चलता तब तक देर हो चुकी थी । खैर उन्होंने एक ही बात कही की तुम भी ये फालतू चीजों में यकीन करते हो । मैंने कहा सर बड़े बड़े आदमी ऐसा करते है तब तो मैं एक अदना सा इंसान हूँ । उनका दूसरा सवाल था कोई पढता है या नहीं ।या इसे ही ऑफिस में कोई काम नहीं तो लगे लिखने ।मैंने उन्हें आश्वासन दिया की सर कुछ मेरे जैसे ही पढ़ने वाले है जो नित्य मेरा ब्लॉग बड़े चाव से पढते है । ये अलग बात है की कमेन्ट करने में कतराते है । और मुझे उनको खोद खोद कर कमेन्ट लेना पड़ता है । वो भी हसते हुए चले गए और बोले लिखो और लिखो जब कोई न पढे तो हमें बता देना । पर मेरा लिखा उससे प्रभावित नहीं हुआ । मैं उतने ही लगन से लिखें में लगा हुआ था । पता नहीं क्यों आब ये मेरे शाम के समय का एक हिस्सा बन गया है । जिसे में रविवार को मिस करता हूँ । फिर ब्लॉग लिखने के बाद पोस्ट किया और घर जाने की तैयारी भी कर ली । ऑफिस से स्टैंड तक बड़े मज़े में पहुचा । स्टैंड पहुच कर देखा की अभी अभी एक बस निकली है वो भी खाली तो मुझे बड़ा खराब टाइप का लगा । की उफ़ खाली बस थी सीट का भी कोई झंझट नहीं होता और मज़े में घर पहुच जाता । पर होनी को कुछ और लिखा था । लगभग १० मिनट पर मेरी आँखों का विश्वास नहीं हुआ । मैंने आँखों को मलने का प्रयास किया पर वो भी सफल नहीं हुआ क्योंकि जो देखा वो सच था । सामने से पूरी की पूरी बस खली मेरे पास चली आ रही थी । और मेरे सारे शरीर में खून की रफ़्तार को तेज कर रही थी । पर वही हुआ जो होना था बस मेरे स्टॉप पर रुकी और उसने मेरे लिए अपने गेट खोल दिए । मुझे बिलकुल रेड कारपेट वाला अनुभव हो रहा था । जैसे में बस का उद्घाटन कर रहा हू । टिकेट ले कर मैं बहुत दिनों के बाद इस बात का चुनाव नहीं कर पा रहा था की किस सीट पर आज बैठू । क्योंकि मेरे साथ कोई ४-५ लोग और चढ़े होंगे ।उनकी भी हालत मेरी जैसी ही थी । वो भी थोड़े भ्रमित टाइप के हो गए होंगे । क्योंकि इस टाइम पर ऐसा चमत्कार बिरले ही होते है । वो कहवत है न की “बिल्ली के भाग्य से छींका फूटा” । आज हमरी किस्मत थी ।उसके बाद तो पूरी बस राजसी सवारी बन कर चली जा रही थी । मैं सबसे आगे की सीट पर बैठ गया । ये सीट कल बिलकुल बग्गी का एहसास दिला रही थी । और पता नहीं क्यों मुझे बड़ा गर्व लग रहा था उस सीट पर बैठ कर । मैं जितना सुख ले सकता था वो मैंने लिया उसके बाद स्टैंड आने पर अपनी सीट को बड़ी मुश्किल से खाली किया ।

Tuesday, April 13, 2010

सुध-बुध खोई पर तू न गयी मेरे मन से

कल की खुमारी अभी तक दिमाग में एस तरह बसी हुई है जैसे कोई खराब गंध बस जाती है । उस दिन रात को देर से नींद आई और चूँकि अगले दिन ऑफिस की चट्टी थी तो नींद भी जल्दी खुल गयी । क्या ऐसा मेरा ही साथ होता है या सबके साथ साथ होता है मैं इससे अभी तक अनजान हूँ । पर उस दिन एक अलग ही खुमारी थी । कभी कभी वों खुशबु मुझे अभी तक अंदर तक हिला देती है । पर अब किया भी क्या जा सकता है । बीती की बिसर कर आगे की सुध लेई । मैं भी कुछ इसी तरह की विचारधारा ले कर चल रहा था । कुछ इस तरह के विचारों में सन्डे बीत गया । और मनडे से वही घड़े की तरह काम करने वाला सप्ताह स्टार्ट हो गया हालाँकि में गधे की तरह तो काम नहीं करता पर और खुद को गधा कह कर पूरे गधे समाज से बैर भी लेना नहीं चाहता । मेरे पापा जिन्हें हम अर्थात सभी भाई बहिन और साथ में मम्मी दद्दू कह कर बुलाते है कहते थे की बोलने से पहले १०० बार सोचना चाहिए एक बार की चूक आपको भारी नुक्सान दे सकता है । इसीलिए ये गधा समाज उपर जो लिखा उसे मेरी भूल समझ कर भूल जाने का प्रयास करिये ये मैं सिर्फ लिखने मात्र ले लिए कर रहा हूँ । सोमवार को वही सुबह सुबह ऑफिस की भागदौड में एक सप्ताह और बीताने के लिए सुबह सुबह घर से निकल चुका था । स्टैंड पर आ कर देखा की आज का तो नज़ारा ही बदला हुआ है आज जाते वक्त स्टैंड पर इतनी भीड़ । फिर वही पुरानी बात याद आ गयी की आज तो सोमवार है । में एक निश्चित बस से ऑफिस जाता हूँ और अनिश्चित बस से वापस आता हूँ । कारण ये है की ऑफिस जाते वक्त उस निश्चित बस में सीट मिल जाती है और कुछ और निश्चित सवारियां बैठती है । बाकी सब सुविधानुसार होता है । उस बस के अधिकतर लोंगो का चेहरा पहचाना हुआ है अब अगर कोई नहीं आता है तो पता चल जाता है फलां सीट का सवारी आ गायब है । सबकी सीट लगभग निर्धारित है । मैं सबको अक्सर एक सीट पर बैठते देखता हूँ जिसके कारण मेरी भी एक सीट पक्की हो गयी है । सोमवार का पूरा दिन बड़े ही सुकून के साथ गुजरा अब शाम हो चुकी थी और ऑफिस से जाने का वक्त होने लगा । पर शायद मुझे आज भी किसी का इंतज़ार था । और मेरी नाक बार बार फडक रही थी । पर वो कहावत है न की बिल्ली के भाग्य  से रोज रोज छीका नहीं टूटता । इंतज़ार इंतज़ार ही रहा और मैं घर की तरफ रवाना हो गया । बस स्टैंड पर आज फिर पुराने लॉन्ग नज़र आने लगे थे । वही जाने पहचाने  चेहरे मुझे स्टैंड पर नज़र आने लगे थे । बस आई और में बस चढ गया । टिकट ले कर एक कोने में खड़ा हो गया । आज मन कुछ उदास था पता नहीं क्यों । पर उसका एक फायदा मिला । आज सब कुछ अपने आप हो रहा था । ५ मिनट के अंदर ही सीट भी मिल गयी । बिना किसी मेंहनत के पर वो न दिखी जिससे देखना था । उस दिन तो नहीं पर आज लिखते वक्त वक्त एक लाइन याद आइ है किसने लिखा है ये तो याद नहीं पर हम पर लाइन बिलकुल सटीक बैठती है । तृषणा तू न गयी मेरे मन से । इन्ही यांदों में खोता हुआ में अपनी सीट पर बैठा हुआ कुछ कुछ खोया हुआ अपने खयालो में सोता हुआ किसी की यादों को सहेजता हुआ बिना बात के हसता हुआ बस से उतर गया ।