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Saturday, May 1, 2010

रिक्शे पे सवारी और उसकी रफ़्तार

आज कल ऑफिस में अत्यधिक काम कि वजह से आने और जाने का सारा समय बदल गया है । जिसके कारण लिखने का समय भी नहीं निकल पात हूँ चूँकि घर पर कंप्यूटर है पर इन्टरनेट न होने के कारण घर पर लिखने का काम नहीं कर पाता हूँ । इसलिए अपने ब्लॉगर के कारण ऑफिस के कंप्यूटर पर ही निर्भर हूँ । उसका एक कारण और है । वो मेरा समय मेरे घर से ज्यादा ऑफिस में ही बीतता है । दिन का कुल १०घंटे से ज्यादा समय ऑफिस में देना पड़ता है जो कि खुद एक बहुत बड़ा काम है । आज लेबर दिवस के रूप में पूरे भारत में मनाया जाता है । बड़े बड़े संस्थान बंद है आज हमरा ऑफिस आज भी खुला है । चलो इसी बहाने मेरा ब्लॉग भी छप जायेगा वरना आज भी नहीं लिख पाता । अगर आपने गौर किया हो तो रिक्शे वालों कि क बात मुझे बड़ी अच्छी लगाती है । जब कोपुरुष रिक्शे पर बैठता है तो रिक्शे वाले के चलने का तरीका बदल जाता है और जब कोई महिला किसी रिक्शे पर बैठती है तो रिक्शे वाले का चलने का तरीका बदल जाता है । जैसी जब कोई लड़का बैठा रिक्शे पर और वो बोल दे कि भैया जरा तेज चलाना तो रिक्शे वाला तुनक कर कहेगा कि भाईसाहब जितना दम होगा उतना ही चलूँगा न अब कोई अपनी जान तो नहीं दे दूँगा । बात भी सही उसकी । चाहे लड़का कितना भी हल्का हो रिक्शा अपने औसत रफ़्तार से थोडा कम ही चलेगा । और दूसरी तरफ कोई महिला रिक्शे पर बैठ जाये तो महिला सवारी के संवाद बदल जाते है उन्हें कहना पड़ता है कि भाईसाहब जरा धीरे चलाओ मुझे इतनी जल्दी नहीं है । ओए ऐसा नहीं है रिक्शेवाले के शारीर पर उसकी रफ़्तार निर्भर करती है  हालाँकि किसी किसी कि करती है पर वो अपवाद है । मैंने कई बुजुर्ग रिक्शे वालों को महिला सवारी बैठा पर भगाते हुए भी देखा मुझे समझ में नहीं आया कि ये रफ़्तार कब से सवारी के लिंग पर निर्भर होने लगी है । काश ये ख्याल मोटरसाइकिल बनाने वाले आविष्कारक को आया होता हो आज मोटर कि जरुरत नहीं पड़ती ।  रिक्शा ही मोटर का रूप ले लेता । आप अगर पुरुष है और रिक्शे पर बैठे हैं तो समझ लीजिए ही आप समय से पहले घर से निकल जाइये वर्ना समय पर रिक्शा तो नहीं पहुचायेगा । मेरा मनना तो ये है कि जहाँ  मोटर को बनाने में इतने लाखो करोडो रुपये खर्च हो रहे है वंही उनको इस  बात को भी गौर करना चाहिए कि ऐसा कौन का गुरुत्व का बल लगता है सवारी रिक्शे वाले में एक्स्ट्रा होर्से पॉवर दे देती है जो उसकी रफ़्तार अपने आप चरम पर पहुच जाती है । मेरी रिक्शे वालों से कोई जातीय दुश्मनी नहीं है पर ये एक ऐसा शोध का विषय था जिसे में बचपन से शोध करना चाहता था कि इसके पीछे कारन क्या है । मैंने इसके लिए कुछ लोगो से बात भी करना चाहा पर उब्को ये टापिक उतना अच्छा नहीं लगा और वो एस सिरे से मुकर गए । मैंने भी वक्त के साथ इसको भूल गया । बस देख देख कर कुछ गौर करने कि कोशिश  अब तक करता हूँ । ये गुण मेरे ख्याल से प्रतेक शहर के रिक्शे वाले में पाया जाता है । चाहे वो कानपूर हो या लखनऊ या फिर बिहार या जयपुर । मेरे ख्याल से ये रिक्शे वालों का कोई विशेष गुण है । जो सिर्फ रिक्शेवालों में पाया जाता है । तो अगली बार जब भी आप रिक्शे पर बैठे तो ऐसा आजमा कर जरूर देखे । और हो सके तो मुझे जरूर बताये । 

Wednesday, April 28, 2010

बस में ठूसी हुई सवारी और कान में हेडफोन

आजकल ऑफिस में बड़े ही अजीब तरह का माहौल है । पता ही चलता कि टाइम पंख लगा कर उड़ जाता है । पता ही नहीं  चलता  कि आने के बाद समय कैसे पास हो गया । और जब ऑफिस से जाने का समय होता है तब पता चलता है अरे अब तो जाने का टाइम हो गया अभी तक तो ब्लॉग का ब भी नहीं लिखा । फिर लग जाता हूँ  जुगाड में मे कि कैसे टाइम निकल कर ब्लॉग को मूर्त रूप दू  । वैसे भी कल ऑफिस अपने समय से थोडा पहले निकला मन में वो चमकता सूरज रात में भी चमक रहा था । और निगाहे रात में भी सूरज को ढूंढ रही थी । पर आज तक  नोर्वे को छोड़ कर रात में कंही कभी सूरज नहीं निकलता ये बात में भूल गया था । में अपनी रफ़्तार में चल रह रहा था । कि स्टैंड तक आराम से जाऊंगा पर मेरे कदमो के साथ यातायात भी रुका हुआ था और इतना कि पैदल चलने लायक भी जगह नहीं बची थी  । पर पैदल चलने वालों को आजतक कोई रोक पाया है जो आज रोक पायेगा । मैं भी दाये बाये करते हुए कार पर चढ़ते हुए अपने रास्ता बना ही लिया और न जाने कितनो ने मेरा अनुसरण किया और मैंने किसी और का किया था । उस समय कार वाले भी कुछ नहीं बोले उन्होंने ऐसा क्यों किया ये मुझे नहीं पता । आज बस स्टैंड कि लाइट खराब थी तो अँधेरा अँधेरा हुआ था । किसी का चेहरा पहचान नहीं पा रहा था और मेरी निगाहें उस खैनी वाले भैया को ढूढ़ रही थी क्योंकि लगभग एक हफ्ते से उनको नहीं देखा था । तो मन में देखने कि एक अजीब सी ईच्छा हो रही थी । आज बस ने कम से कम २० मिनट तक रुला दिया । मेरी वाली छोड बाकी सब आने का नाम ले रही थी और आ कर कर जा रही थी । और उस अँधेरे में हम जैसे मुसाफिर का ध्यान नहीं दे रही थी । उसके बाद बस का आगमन हुआ तो एक साथ झुण्ड के झुण्ड चढ़ने लगे तो बस कि खिडकी से एक सज्जन ने आवाज़ दि कि अरे पीछे २ बस और भी आ रही है । पर उनकी ये आवाज़ सड़क कि आवाज़ में दब कर रह गयी और एक यात्री बस के गेट में । किसी तरह उनको उससे निकला गया तो बस में जान आई और बस ने आगे का गीयर दबाया गया । आगे तो मत पूछो आज बस में अपने आप ठूस ठूस के सवारी अपने आप चड गयी थी । और बस वाले ने बस को सिर्फ उतरने वालों के लिए ही खोलने का निर्णय लिया । ये भी एक तरह का हाहाकार था । उनके लिए जो बस के बहार थे और बड़ी देर से बस का इंतज़ार कर रह थे । तो बस जहाँ रूकती वो आगे या पीछे कंही से भी चड़ने के लिए बेताब हो जाते और मैंने देखा कि एक दो को इसी कारण चोट भी लगी और वो गाड़ी वाले पर गुस्सा भी हो गए । पर इन सब से एक व्यक्ति अनजान था । उसको किसी भी दुनिया कि खबर नहीं थी क्योंकि वो अपने कान में हेडफोन लगा कर मस्ती में आँखें बंद कर के गाना सुनने में लगा हुआ था । उसको ये भी होश नहीं था कि आसपास क्या हो रहा है । और तो और वो गाना सुनने के साथ साथ गाना गाये भी जा रह आता । कभी गाना इंग्लिश का होता तो कभी हिंदी । और सुर माशा अल्लाह वो भी बड़े चुन चुन के निकल रहे थे । और जब किसी के कानो में हेडफोन लगा होता है तो उसके सुर अपने आप तेज हो जाते है जैसे उन जनाब के थे । उनको इसका भी पता नहीं चला कि कब धूल वाली आंधी ने बस पर हमला किया और निकल गयी । मैंने भी स्टैंड आने पर उतरने का फैसला कर ही लिया ।

Tuesday, April 27, 2010

बस का नहीं ऑटो वाले भैया को धन्यवाद

एक बार पुनः आप सभी से क्षमा चाहूँगा कि मैं पुरे ३ दिनों के बाद ब्लॉग पर आया हूँ । इसके पीछे मेरी ही कुछ कहानी है जिसे में बयां नहीं कर सकता हूँ । पर सच मानिये लिखते वक्त बड़ा सुकून मिलता है । आज में सबसे पहले उस ऑटो वाले भैया को धन्यवाद देना चाहूँगा जिसने मेरी जान बचायी । अगर वो सही समय पर ब्रेक पर पैर नहीं रखता तो आज में कंप्यूटर पर ऊँगली नहीं रखता । तो धन्यवाद अनजान ऑटो वाले भैया । हुआ ये था कि सोमवार का दिन था धूप अपने चरम पर थी पता नहीं मुझे  क्या हुआ मैं १० मिनट के लिए ऑफिस के बाहर चला आया और धूप का आनंद लेने लगा मतलब अपने काम से ऑफिस के पास वाले मार्केट में जाने लगा ।  काम करके जब में  मार्केट से वापस आने लगा तो एक गोल चक्कर पड़ता है रास्ता उतना चला नहीं है जितना चलना चाहिए मैंने देखा रोड के दूसरी तरफ एक बड़ी ही सुंदर सी विदेशी महिला ऑटो का इंतज़ार कर रही है । सच मानिये मेरी रफ़्तार को वंही पर ब्रेक लग गया । और एक बात और अपनों मनना पड़ेगा जैसे धूप में शीशा चमता है उसी तरह वो विदेशी महिला चमक रही थी । उसका भी कारण था । उसके कम से कम वस्त्र । उसने सुपर मिनी स्कर्ट पहन राखी थी जिससे उसका आधे से भी जायदा शारीर दिखाई दे रह आता और धूप में चमक रहा था साथ में छोटी सी टीशर्ट जिससे धूप भी टकरा कर शर्मा रही होगी । खुदा कसम वो सच में बाला थी । उम्र कोई २०-२१ कि होगी । मैं बस उसको ही देख रहा था और मेरी सुधबुध खो सी गयी थी । और शायद मुझे ये भी याद नहीं टइ मैं रोड के बीच में चल रहा हूँ कि तभी चीईईईई कि आवाज़ से किसी ने ब्रेक लगायी तो होश आया कि में एक ठीकठाक रफ़्तार वाली ऑटो के ठीक सामने खड़ा हूँ और शायद मेरी उस स्थिति का अंदाजा उस ऑटो वाले भैया ने भी लगा लिया और वो मुस्कुरा कर बोले कि देखो देखने में कोई बुराई नहीं है पर चश्मा लगा कर । मुझे बड़ी झेप का एहसास हुआ । पर एहसास फिर भी ना जागा । अभी भी दिल था कि मानता नहीं वाला हो रहा था । ध्यान रह रह कर उसी तरफ जा रह आता । ऑटो से बचने के बाद दिल धडकन ने गति पकड़ ली थी । पर उसको अब तक ऑटो नहीं मिली थी । उस दिन मुझे थोडा सा पझ्तावा हुआ कि मैं ऑटो वला क्यों नहीं बन गया । पर कोई नहीं दूर के ढोल हमेशा सुहावने नहीं होते । वो मुझे एस खेल कि शातिर खिलाडी लग रही थी क्योंकि सब ऑटो वाले उससे जायदा कि उम्मीद कर रहे थे पर वो अपने कपड़ो के हिसाब से कम कि । पर ऑटो वाले ठीक उसका औलता सोच रहे थे । उनको चाहिए था ज्यादा । मैंने कुछ देर रुकने का मन बनाया और सोचा कि अब ऑटो करा ही दू तो जायदा अच्छा है ।कंही कुछ उल्टा सीधा न हो जाये । इसी क्रम में में एक पेड का सहारा ले कर खड़ा हो गया और सोचने लगा कि कंही ये मोहतरमा अगर बस में चले तो रोज बस में दंगा भड़क जायेगा और रोज अग्निशमन दल को बस में आग बुझाने के  लिए बुलाया जायेगा । पर इसका बस के बाकी लोग  कतई बुरा नहीं मानेगे इतना तो मुझे पक्का विश्वास है । और मैं भी सहमंत हूँ ।  वैसे कई लोगो को मेरा ये व्यव्हार बुरा लग सकता है पर इसमे मेरा कोई दोष नहीं है । अगर आपके चेहरे पर कोई चमकती चीज़ टकराएगी तो आपकी निगाह तो जायेगी ही । और एक बात और कहना चाहता हूँ कि इस व्यक्ति विशेष लक्षण से पता चलता है कि मैं अपने ही पर्यायवाची का नहीं बल्कि अपने बिलोम का प्रेमी हूँ ।