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Monday, July 12, 2010

जम के बरसो आज ........

जम कर बरसो आज
धो दो सारी पानी वाली आग
लोग हो जाये तुमसे निहाल
और फिर कहे तुम क्यों आये आज

तुम तब भी ना रुकना
तुम अपने वेग तो मत थमने देना
रफ़्तार और बढा देना
बुँदे और बड़ी कर देना

फिर लोग कहेंगे
आज तुम क्यों बरसे , इतना विशाल
तुम फिर भी मत सुनना इनकी
ये तो लोग है ये सिर्फ कहते है

तुम कम बरसो तो ये कहेंगे
ना बरसो तो ये कहेंगे
कम बरसो तो ये कहेंगे
मंद बरसो तो ये कहेंगे

तुम करो वही जो तुम्हे लगे सही
जितना मर्ज़ी हो उतना बरसो
दिखा तो रास्तो को रास्ता
जम के बरसो आज

Wednesday, July 7, 2010

बस में यात्रीयों की कुछ खास आदतें

सुबह उठने अगर आपको ५ मिनट भी लेट होता है तो आपकी पूरी दिनचर्या डांवाडोल हो जाती है ।  फिर एक के बाद एक आप लेट ही होते जाते है । जब तक की आप किसी एक महत्वपूर्ण काम को छोड ना दे । पर उसको छोडना भी एक साहस वाला काम है । की किसी महत्वपूर्ण काम को ना किया जाये । क्या आप मुह साफ़ नहीं करेंगे, नित्य कर्म से नहीं निपटेंगे , क्या आप ठीक तरह से नहीं नहा कर कंकड स्नानं करने पर जोर देंगे । नहीं ना मेरे साथ ऐसा अक्सर होता है । मैं जरा सुबह उठने में आलसी हूँ । ऐसा नहीं है की में उठता नहीं हूँ में रोज सुबह ब्रह्म मुहर्त में उठता हूँ । और फिट समय देख कर सो जाता हूँ । जिसका जी परिणाम होता है की पिछले १ सप्ताह से में अपने समय वाली बस नहीं पकड़ पाया । उसके पीछे वाली बस में आता हूँ पर पीछे वाली बस रास्ता साफ़ होने के बावजूद आगे वाली बस से कभी आगे नहीं होती बल्कि मेरी तरह आराम से चलती है । और बस में एक चीज़ साफ़ साफ़ शब्दों में लिखी है की आप लेट हैं हम नहीं । अरे इतना साफ़ और बड़ा बड़ा तो उनकी टिकेट पर रुपये भी छापते जितना बड़ा उन्होंने ये उपदेश लिख रखा है । में अपनी नियमित बस की सवारिओं को बड़ा मिस करता हूँ । उसका कारण भी है उस बस में मुझे पता है की अब सीट खाली होने वाली है तो पहले से सेटिंग बन जाती है । मगर मेरे इस बस अगर आपको पता भी है की फलां सीट खली होने वली है तो उसके हिलने से पहले कई लोग हिल हिल के वंह पहुच जाते है । कोई गलती से पुच ले की भाई साहब फलां जगह आये तो बताना । तो सामने वाला उस स्टैंड से २-३ स्टैंड पहले से सीट पर बैठने के लिए कह सेट है की आगे वाला स्टॉप आपका है उतर जाइये । और खुद बैठ बैठ जाता है । और वो भीड़ में बड़ी मुश्किल से गेट पर पहुचता है तो पता चलता है की अभी थोडा टाइम है । पर वो भीड़ का हिस्सा बन जाता है और जिससे सीट मिल गयी वो सीट का । मैंने तो एक बार ऐसा भी होते देखा की एक जनाब यही सोचते हुए १ जनाब को २ स्टैंड पहले उठवा दिया पर उनकी बोये बीज का फल एक जनाब खा गए और उनके बैठने से पहले वो बड़ी शान से बैठ गए और उस आदमी से बोले की भाई साहब आप खड़े रहे आपका स्टैंड अभी दूर है । स्टैंड पर उतना वाला व्यक्ति अपनी खिसियाहट उतार नहीं पाया और गेट पर खड़ा हो अपनी यात्रा को पूरी करता रहा । सीट का मोह इतना बड़ा है की कई महिलओं की सीट बड़ी फक्र से बैठे रहते है । और केवल खूबसूरत महिला या लड़की को देख कर उठते है और तो और कभी वो भी नहीं । जब कोई कह देता है है तो बहस करते है और नियम कायदे कानून की बात करते । और अगर कोई महिला सीट पर किसी तरह बैठ जाये तो कोशिश करते है की सीट पर उनका कोई ना कोई हिस्सा छूता रहे । पता नहीं ये किस तरह का कुर्सी का मोह है या स्त्री का मोह है । पर जो भी बड़ा ही हीन है । कुछ पुरुष सिर्फ महिला सीट पर बैठना ही पसंद करते है चाहे बाकी की सीट खाली क्यों ना हो । पता नहीं उस सीट पर बैठ कर किस तरह के सुकून की प्राप्ति होती है ये मेरे लिए बड़ी ही जिज्ञासा का प्रश्न है । और कुछ महिला सीट पर बैठ कर बड़ी बेसब्री के साथ किसी सुंदर महिला के आने का इंतज़ार करते है और बड़ी प्रसनत्ता के साथ उनको सीट देते है और फिर किसी और सीट के जुगाड में लग जाये है या उसी महिला या लड़की के पास खड़े होने का सुख प्राप्त करते है । और अगर कंही कोई बुजुर्ग महिला आ जाये तो उनका चेहरा देखने कायक होता है । 

Friday, June 25, 2010

बड़े दिनों के बाद एक बार फिर ब्लॉगर के साथ

आज एक बार फिर इतने दिनों के बाद आपके सामने कुछ लिखे का मन हुआ है । पिछले लगभग एक महीने से कुछ ज्यादा ही व्यस्त था जिसके कारण में ब्लॉग में एक भी एंट्री नहीं लिख सका । इसके पीछे कुछ कारण थे । कुछ तो अपने काम में व्यस्त होना अर्थात ऑफिस में थोडा अधिक काम था । और जब उससे कुछ फ्री हुआ तो मेरे पिता श्री जिन्हें सभी जानने वाले चाहे वो छोटे हो या बड़े दददू कहते थे उनका अचानक देहांत हो गया जिसने मुझे पूरी तरह से पंगु बना दिया । आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखे बैठा हू । पर ये समझ नहीं आ रहा है क्या लिखू । यात्रा का विवरण लिखू या क्या । जब दददू के बारे में पता चला तो पूरा का पूरा स्तब्ध रह गया । खैर मृत्यु एक ध्रुव सत्य है  जिसे में क्या बाबा राम देव भी नहीं टाल सकते । उसके बाद पुनः दिल्ली आने के बाद फिर काम में ऐसा रमा की लिखें की आशा आस लगाये बैठी थी की कब में आस से उठ कर बैठू और लिखना शुरू करू ।

आपको बाता दू इतने दिनों से ना लिखने के कारण बहुत सी कहानिया मेरे दिमाग के समुन्द्र में गोते लगा रही  है पर उनको मैं चुन नहीं पा रहा हूँ । यही सोच कर अब में ओक्सीजन लगा कर उस गहरे समुन्द्र में उतरने की तयारी कर चुका हूँ और ये सोच कर बैठा हू की आज समुन्द्र से कोई भी मछली ना पकडूँगा बल्कि सिर्फ उन्हें चारा दे कर आ जाऊंगा ताकि कल से वो रोज मेरे लिए किनारे पर आये और मुझे नित नयी बात याद आये ।

इतने दिनों में क्या क्या नहीं बदला किसी देश का प्रधानमंत्री , वर्ल्ड कप के महारथी , भारत का क्रिकेट इतिहास तो फिर मेरी बस क्यों ना बदलती । मैंने भी अपनी बस बदल ली थी । अब मैं नए रूट और नए बस की सवारिओं के साथ आता हूँ । कहते है परिवर्तन जीवन के लिए अच्छा होता है।

मेरे साथ भी कुछ कुछ अच्छा रहा । बस का माहौल अच्छा था । ऑफिस पहुचने में पुरे २५ मिनट की बचत होती थी । जिसके कारण अब में आराम से ३० मिनट ज्यादा सोता था । मेरी भाभी को ३० जायदा सोने की भी आजादी मिल गयी । अलबत्ता मेरे भतीजे जनाब अब वक्त से १ घंटे पहले सो कर उठ जाते है । जिसका नुक्सान मुझ जैसे गरीब को उठाना पड़ता है । पर उसके साथ थोड़ी देर खेल कर उस १ घंटे के नुकसान से बाबा रामदेव की कसरत के समान उर्जा शरीर आती हुई लगती है । सरे अंग भलीभांति चलते हुए लगते है । वैसे बस में रोज ना रोज कुछ ना कुछ ऐसा वैसा अजीबो गरीब द्रश्य परिद्रश्य नज़र वजर आ ही जाते है । जिनका मैं कल से जिक्र करना शुरू कर दूँगा । पर इतना तो जरूर है की पुराने रूट और नए रूट में बहुत अन्तर है । पुँराने रूट में जन्हा नित नए स्ट्रैंड पर कुछ ना कुछ होता रहता था यंह पर स्टैंड नियत है जिन पर घटनाये भी नियत है । पर जो जो होता है वो भी कम रोमांच पैदा नहीं करता ।