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Saturday, August 7, 2010

सुबह सुबह शिव के दर्शन, चलती बस में कीर्तन

क्या सोचू क्या लिखू  कभी कभी खुद से यही पूछता हूँ । खुद से कभी कभी । जवाब वही आता है जो लिखें वाला हूँ चुप चाप जो मन में आये लिखे जायदा पका मत
सच में यही वो ख्याल है जब में थोडा ज्यादा ही सोचने लगता हूँ । तो प्रयास कम ही करता हूँ । मैं अपनी रोज ही जिंदगी रोज जी रहा हूँ । रोज कुआँ खोदता हूँ रोज पानी पीता हूँ । क्या मज़े है अपनी पीने का ।

यही सोचता हुआ ऑफिस के लिए रोज घर से निकलता हूँ ।वही बस में पुराने चेहरे , वही टिकेट काटने वाला वही गाते पर खड़े रहने वाला , वही बस की सबसे आगे की सीटों पर रोज बैठने वाली महिलाये(कुछ बालिकाएँ भी) वही रोड वही रास्ते । सोचता हूँ कब तक यूँ ही चलता जाऊंगा, कब जा कर विराम पाउँगा । इस रोज रोज झान्जह्त से कब में मुक्त हो पाउँगा ।

नित कुछ नया करने के उद्देश्य से नेट पर मेल चेक करता हूँ और कुछ नया ना पा कर फिर काम में लग जाता हूँ । काम का भी वही हाल है , मेरे से बुरा उसका हाल है । वो भी मेरे पास आ आ कर थक गया है उसे भी किसी और की दरकार है । बिना बात के काम है काम के काम है उसके बाद थोडा आराम है । पर कभी कभी उस आराम में भी थोडा काम है । और तो और आराम भी एक काम है ।

यही सोचता हूँ और काम कम आराम ज्यादा करता हूँ । चलो थोड़ी बस की बात हो जाये । बात थोड़ी पुरानी है बस में खड़े खड़े सफर कर रहा था की तभी कीर्तन की आवाज़ आई हरे कृष्णा हरे राम राम राम कुछ ऐसा ही था । मुझे ध्यान आया की यार रास्ते में तो ऐसा कोई मंदिर है नहीं जहाँ के भक्त इतने बहकती करने वाले हों । तभी बगल से सरकारी बस का द्रश्य साक्षात् दर्शन हुए और सारे के सारे ख्याल हकिकत में बदल गए । बस के पीछे वाली सीटों पर पूरी की पूरी कीर्तन मंडली बैठी थी । मेरे ख्याल से सरे के सारे एक ही ऑफिस के या एक ही कॉलोनी के रहे होंगे । वो पूरी तरह से तैयार खिलाड़ी लग रहे थे । क्योंकि वो ढोलक , मंजीरे और करताल से सुसज्जित थे । पूरी बस उस कीर्तन का आनंद ले रही थी । और सुनने वाले भी या कहे तो साथ चलने वाले भी । पर बस के अंदर या ये द्रश्य देखें में बड़ा ही अजीब लग रहा था पर आँखों और कानों  को उनके कीर्तन सुकून बड़े दे रहे थे । और अंदर से एक ही पुकार आ रही थी की चलो कम से कम दिल्ली जैसे शहर में ऐसा नज़ारा देखा जहाँ पर शायद दर्शन उनके दुर्लभ होते हैं जैसे दिल्ली में हैंडपंप । दुर्लभ से मेरा मतलब मंदिर से नहीं इंसानियत से है । मुझे उन भक्त जानो पर बहुत ही जायदा खुशी हुई की कैसे उन्होंने समय का सदुपयोग किया । आज कल के समय में हमें पूजा पाठ करने का टाइम नहीं होता । मैं बस से देखता हूँ की बहुत लोग कार के अंदर ही पूजा करते हैं । जूते उतार कर कार में ही हनुमान चालीसा या जो भी उनके इष्ट देव हो उनको याद कर लेते हैं । बड़े शहर में हर कोई समय का सदुपयोग करने में लगा है । कोई अखबार ले कर ही सुबह शौचालय में चला जाता है पूछो तो कहता है यार अंदर क्या करूँगा इसी बहाने अखबार भी पढ़ लूँगा। समय भी बचेगा मुझे ये समझ में नहीं अत है की एक साथ दो काम कैसे कर लेते हैं लोग वो भी निहांत एकाग्रता वाली जगह पर जन्हा पर कोई आवाज़ भी दे दे तो पूरी की पूरी मेहनत बेकार हो जाटी है । और नए सिरे से प्रयास करने होते है । अरे क्षमा चौंगा की बस की बात से पता नहीं कहाँ खस पे चला गया ।  

Wednesday, July 21, 2010

बस में वियाग्रा गुरु का व्याख्यान, सफर में हुआ आराम

बात को २-३ दिन बीत चुके हैं । मुझे नहीं पता ये २-३ दिन मेरे किस तरह बीते हैं ।  समोसे वाली घटना के बाद में बड़े ही संभल कर बस में सीट चुनता हूँ । वक्त शाम का था ऑफिस से जाते हुए मैंने उस दिन समोसे के बजाय भुट्टे को प्राथमिकता दि । दिल्ली के भुट्टों में वो मज़ा नहीं है जो कानपूर के भुट्टों में में । वो कहते हैं ना दुधिया भुट्टा मैंने दिल्ली में बिकता नहीं देखा । दुधिया भुट्टे की बात ही निराली है क्या मुलायम दाने, नमक से साथ मुह में पानी की तरह घुलते है । बस में भुट्टों की महक ,में खो सा गया था । उसके बाद बस खाली मिली तो रहत भी मिली । मैं एक सीट पर चिपक कर बैठ गया । २-३ स्टॉप के बाद बस में थोड़ी भीढ़ हो गयी । जिससे लोगों की तादाद बढ़ गयी और वो पास पास आते चले गए । मेरे पास जो बस में खली जगह होती है वहाँ पर २ सज्जन से दिखने वाले व्यक्ति आ कर खड़े हो गए । दिखने में तो वो बड़े ही सज्जन पुरुष प्रतीत हो रहे थे पर ५ मिनट बाद प्रतीत से प्र हट गया और उनके तीत बहार आने लगे । उनमे से एक व्यक्ति तो बाबा वियाग्रा दास निकले । उनके पास हर मर्ज़ की दवा थी । जो अपने कई बार दीवारों पर देखा होगा पर कोई देख ना ले एस डर से जायदा नहीं देखा होगा या तेज़ी से पढ़ लिया होगा । उनके साथ वाला चाहे किसी भी बात पर बात करे बाबा उसमे एक शक्ति वर्धक दवाई जोड़ देते थे । और उनका निशाना बिलकुल सही जाता था । उनके पीछे उनके ही तर्क थे जिससे उनका सामने वाला पूरी तरह से संतुष्ठ हो जाता था । पता नहीं या तो वो पूरी तरह से नादान था या तो बाबा की भक्ति में लीन भक्त । वो उससे उस शक्ति वार्धर दवा के कई सच्ची कहानियाँ एक के बाद एक कर के सुना रहे थे और उनका बहकत बीच बीच में अपनी जिज्ञासा भी शांत कर रहा था की गुरु जी ऐसा क्यों होता है इसका कारण क्या है । और बाबा बड़े ही तन्मंता से उसकी बात का जवाब देते थे । उनकी बातों से मुझे लगा की बाबा का एक एक खानदान वासी उस शक्तिवर्धक दवा का ही परिणाम है । क्योंकि उनके अनुसार छोटा हो या बड़ा, साडू का बेटा हो या भाई का , या फिर बहिन का  सब बाबा की दि हुई चमत्कारी दवाई के बल पर आज अपना नाम रोशन कर रहे हैं । वर्ना उनकी क्या मजाल की वो किसी लायक थे । पर बाबा में उनकी इस समस्या को तुरंत जाना और हल बाता कर उसका वैवाहिक जीवन तबाह होने से बचा लिया । और तो और उनका साफ़ कहना था की पुरुष अगर बिना उस दवाई के कुछ नहीं है । अर्थात शून्य है । इसके बाद तो उनका भक्त कुछ डर सा गया । मेरे हिसाब से उसकी उम्र कोई ३५-३६ के पास के आस पास होगी और बाबा भी लग्बह्ग इसी के करीब होगा ।पर बाबा था बड़ा जी जमा हुआ खिलाडी । सारी बातों का इस तरह से वैवाहिक जीवन से जोड़ कर उस व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर छा जाने को बेताब था और उसके भक्त की बातों से लगा की वो बाबा सफल हो गया था । उन दोनों ने रास्ते भर कुछ एस तरह की बातें की और सवाल किये की मैं लिख नहीं सकता पर समझ जरूर गए होंगे । मेरा ये सोचना है ऐसे ही कम और नासमझ लोंगो का फायदा झोलाछाप डॉक्टर उठाते है और ना जाने क्या से क्या कर देते है व कई बार तो घर की इज्ज़त जाती है और कई इज्जत , लाज , मान मर्यादा और तो और अपने प्रिय की जान तक से हाथ धोना  पड़ता है । कृप्या ऐसा कुछ ना करे ,,,,,,,,,,,,,,

Friday, July 16, 2010

बस में २ तरफ़ा हमला और मैं बेचारा अकेला

कल मुझे एक जरूरी काम से कंही जाना था पर ऑफिस में थोड़े काम की वजह से में वो काम नहीं कर पाया । खैर उसका कोई मलाल नहीं । मैं भी रोज की तरह मस्ती में ऑफिस से घर की तरफ गुनगुनाते हुए निकला । इस बात से अनजान की आज बस में आज मेरे पर हमला होने वाला है । रास्ते में अचानक मेरी संवेदी तंत्रिकाओं ने कुछ जानी पहचानी खुशबू को महसूस किया । वो खुशबू गरमागरम समोसे की थी । ये मेरी कुछ कमजोरीयों में से एक है अगर मेरे पास जेब में रूपये पर्याप्त मात्र में हैं यअ थोड़े कम भी हैं तो में समोसे खा कर बाकि चीजों से समझोता कर सकता हूँ पर गरम समोसों से नहीं । मैंने तुरंत खुशबू की दिशा में कदम बढ़ा दिए । और समोसो को खा कर हो दम लिया । वो पुदीने वाले समोसे और पुदीने वाली चटनी के साथ लगता था अगर दिल्ली में कंही स्वर्ग है तो यंही है यंही है और यंही है । वैसे भी मैंने दिल्ली में इतने अच्छे और सस्ते (दिल्ली के हिसाब से ) समोसे शायद पहली बार खा रहा था । समोसे खाने की मेरी अपनी ही अदा है । अगर दुकान में जगह है तो में गरम समोसे वंही खाना पसंद करता हूँ वर्ना चलते चलते खाना में पसंद करता हूँ । एक बार समोसे एक बार चटनी , फिर समोसा फिर चटनी , बस यही क्रम चलता है । और बीच बीच में गरम आलू से जीभ का जलना भी बड़ा अच्छा लगता है पर संतोष नहीं होता की समोसे को ठंडा होने दू तब खाऊ । इन समोसे के चक्कर में कब बस स्टैंड पर पहुंचा पता ही नहीं चला । फिर भी मेरे समोसे मेरे हाथ की शोभा बढ़ा रहे थे । कुछ लोग के मुह में पानी और कुछ के जलन हो रही थी मेरे इस तरह खाने की अदायगी से । पर में भी मानने वाला कहाँ था चाहे समोसा कितना भी गरम क्यों ना हो । फिर जब बस आई तो जल्दी से उपर चढ़ना भी नहीं भुला सीट जो हथियानी थी । यहीं से मेरे रात की पीड़ा शुरू हुई । मैंने सीट तो हथिया ली पर जल्दी जल्दी में ये नहीं देखा की पिच कौन बैठा था । इसका एहसास मुझे बैठे और लगभग सभी अच्छी सीटों के भर जाने के बाद हुआ । मेरे पीछे जो जनाब बैठे थे वो शायद साउथ के कोई जनाब थे । और किसी महिला मित्र से अपनी भाषा में बतिया रहे थे । और ना जाने वो किस भाषा का प्रयाग कर रहे  थे मुझे कभी वो तेलगु लगती कभी उड़िया तो कभी कुछ और । बस बीच बीच में कुछ संस्कृत के शब्द समझ में आ जाते और कभी कुछ इग्लिश के । मैं उन्ही शब्दों को सुन कर संतोष करने की कोशिश कर रहा था । ये सारे स्वर में दाहिने कानो से सुनाई दे रहे थे । और मेरे बाये काम में एक बहुत की प्रेमिका को समर्पित प्रेमी के शब्द उस अन्य राज्य वाले शब्दो के साथ में मस्तिष्क में मंथन कर रहे थे । वो अपनी प्रेमिका से बड़े ही अजीब तरीके से बात कर रहा था । वो कभी उससे प्यार से बात करता कभी गुस्से से उसका कुछ पता नहीं था की कब क्या कह दे । पर मेरे मस्तिष्क में एक अजीब से पीड़ा हो रही थी ना मुझे चैन था ना मुझे नींद । मुझे दोनों पर दया आ रही थी की देखो बेचारे कितने लगन भाव से सरकार को सेवा कर देने में लगे है और एक मैं हू की चुपचाप इनकी बात सुन रहा हूँ । उन दोनों की बात मेरे स्टॉप पर आने  तक खतम नहीं हुई थी । में उनकी बात से कुछ इस क़द्र बेझिल हो गया था की मैंने एक स्टॉप पहले उतरने का निर्णय ले लिया । और अपनी सीट किसी और को देने का प्रयास किया वो मेरे पास वाले मुझसे ज्यादा चालाक निकले शायद वो उसको पहले से जानते थे और मेरी सीट खाली की खाली ही रही ।