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Monday, September 6, 2010

बस में मैं भी हुआ शिकार, जुदा हुआ यादों का संसार

मुझे बस में यात्रा करते हुए कोई 2 दशक से थोडा कम ही हुआ होगा बस इतने सालों को ब्लॉग के जरिये समेट पाना थोडा मुश्किल काम है पर में इसे लगातार लिखने का प्रयास करता हूँ ताकि धीरे धीरे ये इतने साल महीनो में बदल जाये और मेरी आदत लग जाये । ब्लॉग लिखेने की शुरुवात एक मजाक मजाक में हुई थी पर अब ये थोड़ी थोड़ी आदत में बदल गयी है । अब ब्लॉग लिखें में मज़ा आता है और शब्दों का विस्तार भी होता है । जिससे मुझे लगातार लेखन में मदद मिलती है । कुछ हाफ़ पतलून वाले मित्र पढ़ भी लेते है और थोड़े अनजान कमेन्ट भी कर देते है । जब कोई ब्लॉग पर कुछ लिखता है तो बड़ा मज़ा आता है और जब कोई मेरे ब्लॉग पर कुछ टिप्पणी करता है मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित करता है जिससे मैं थोडा और अच्छा लिखू ।

बस के इतने सफर में मैंने बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ लिखा । आज जो लिखूंगा वो थोडा हास्यप्रद और थोडा गुदगुदाने वाला होगा । कभी आपने चोर पे मोर वाली कहावत सुनी है अगर नहीं सुनी तो आज सुन भी लीजिए और पढ़ भी लीजिए । बात शनिवार की है जगह मेरे घर के पाससस तो नहीं हाँ उस स्टैंड की जरूर है जहाँ  से में रोज बस पकड़ता हूँ । मेरे पास 2004 मॉडल का नोकिया 1112 फोन था जिसपे मेरे सारे घरवालों की निगाह थी क्योंकि मेरा फोन मेरी तरह बेशर्म था पिछले 4 सालों से ना खराब हुआ था ना किसी ने उसे चोरी करने का साहस किया तो उसे भी खुद पे बड़ा घमंड था और साथ में मुझे भी था क्योंकि शायद ही किसी के पास कोई मोबाइल इतने समय तक चला हो । उसे रखने का एक कारण और था उससे जुड़ी यादें । जिन्हें मैं बड़ी ही नजाकत से सम्भाल कर रखे हुए था उस फोन ने हर सुख में और हर दुःख में मेरा साथ दिया था । न जाने कितनी बार किसी के हाथ में जाने के बाद भीनी सी खुशबू ले कर वापस आया था वो फोन(बैज्ञानिक उसे  बैक्टीरिया बोलते हैं ) ।  सच कहू तो मुझे ये याद नहीं की वो फोन मेरे पास कैसे और किस कारण से आया था । पर वो फोन मेरे बहुत करीब था । बहराल रोज की तरह मैं बस का इंतज़ार कर रहा था । उस दिन में ऑफिस जाने में लेट बहुत लेट था क्योंकि शनिवार था और शुक्र की रात में 1 बजे तक काम हुआ थ ऑफिस में तो देर से जाने का हकदार था । आज मुझे नयी बस से जाना था क्योंकि उस रोज मेरी रोज वाली बस का समय नहीं था । पता नहीं क्यों बस में आज भीड़ थी पर जब अंदर चढा तप पता चल की बस के गेट को 2-3 लोगों अजीब तरह से घेर रखा है ना कोई आगे जा पा रहा है ना पीछे । तभी मुझे शक हुआ और मैंने अपना मोबाइल चेक किया । जेब में अपने मोबाइल को महसूस कर के बहुत अच्छा लगा पर मेरा विश्वास भी भी दूर नहीं हुआ था पर पीछे से आई भीढ़ ने मुझे जबरन आगे आने पे मजबूर कर दिया और मैं आगे बढ़ गया । पर मेरा ध्यान मोबाइल से हट गया । यंही वो गलती थी जो मुझे नहीं करनी थी पर क्या करता । जो होना था वो हो गया । जेबकतरों के ग्रुप ने मेरा मोबाइल निकाल लिया था । और अब तक मुझे पता नहीं था चूँकि बस में भीड़ थी तो मेरा ध्यान भी गया । पर चोरों ने काम लगा दिया था । जब बस 2 स्टॉप पार कर गयी तो मुझे मोबाइल के चोरी होने का अहसास हुआ । फिर जो होना था वो हो चुका था मेरी यादों का उड़नखटोला उड़ चुका था । अब मुझे कभी कभी बड़ा दुःख हो तो कभी संतोष क्योंकि में मुझे थोड़ी खुशी भी थी थोडा गम भी । खुशी इस बात की थी की मैं अब नया फोन खरीदूंगा और गम इस बात का की आखिरकार मेरी यादें मुझसे जुदा हो गयी जिन्हें मैंने बड़ी जतन से संभल कर रखा था । बस से उतर कर मैंने सबसे पहले पुलिस को सूचित किया । और नए मोबाइल की खोज में लग गया । अभी भी मेरा विश्वास है की चोर उस बस को दुबारा शिकार जरूर बनायेंगे ।  अब कोई कैमरा वाला फोन लूँगा ताकि उन चोरों की पिक्चर ले कर पोस्ट कर सकू ताकि बाकी लोग भी सावधान हो सके । नोकिया का x2 फोन अच्छा है उसके आने के इंतज़ार में हूँ । 

Wednesday, September 1, 2010

अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

आप कभी कभी चाह कर भी कुछ नहीं लिख सकते क्योंकी आपका मन नहीं लगता है । कुछ करने में बहुत कुछ सितम सेहना है । इतने दिनों से ब्लॉग से दूर हूँ पर सच मानिये मन से नहीं तन से मजबूर हूँ ।  दिल हमेशा सही कहता है ये हर शायर कहता है । वैज्ञानिक दिल छोड कर दिमाग की बात मानने को कहता है । पर हमारे के पास दोनों रहता है । वक्त के साथ दोनों की बात मानते है और दिल बच्चा है कह कर दिल और दिमाग को शांत करते है ।

बात पिछले रविवार की है बहुत दिनों के बाद बाइक की सवारी लेने का मौका लगा  क्योंकि उस दिन रविवार था । पर अकेले जाना का सुख हमें नहीं प्राप्त नहीं था नाना जी साथ मेरे साथ था । वर्ष उनके ८० है शुद्ध दही की बनी लस्सी है । चम्मच से खाने जितने गाढ़े हैं तभी तो आज भी सबके प्यारे हैं । उनको ले कर कम से कम २०० किलोमीटर की यात्रा करनी थी । वो भी बस दिल्ली के अंदर करनी थी । माथा मेरा सुबह से खराब था थोड़े रास्तों से में अनजान था । मैंने भी हेलमेट सर में लगाया एक कनटोपा नाना जी को भी थमाया । नाना जी देख कर चौके, मैं कहा पहनो नहीं तो किसी और को पकड़ो । फिर दोनों का काफिला चल पड़ा हर गड्ढे के बाद नाना के मुह से मारा गया राम फूट पड़ा । कॉमन वेल्थ के चक्कर में नाना जी का हेल्थ डोल गया पूरा बुढा  शरीर झोल गया । हमने अपनी यात्रा फिर भी ना रोकी और काफिला फिर भी चलता गया । रास्ते में कुछ अजीब अजीब प्राणी से मुलाकात हुई । हालाँकि उनसे मुलाकात २० सेकंड से ज्यादा नहीं थी । पर वो कुछ दिल और दिमाग में छाप छोड गए । मैंने एक ठेठ हरयाणवी से पता पूछा उसने साथ में ४-५ और बता दिए- तू ऐसा कर सिद्धे चला जा आगे से मोड पे शर्मा जी मकान अयेगा उसे बाद अपने भतीजे का फिर एक का और आयेगा तू उसके बाद की रोड पे मुड जाना और फिर किसी से पूछ लेना । मुझे इतना गुस्सा आया गुस्सा पी के मैंने सारा गुस्सा गति बढ़ा कर निकाला । आगे एक रिक्शे वाले से पता पूछने का ख्याल दिल में आया बाद में उस ख्याल पर बहुत से जातिवाचक शब्दों से उसका अंत करवाया- भैया ये फलां पता बताओगे । उसके अंदर कस्टो मुखर्जी का साया पाया । ये पता तो मुझे मालूम है क्या तुमको यंही जाना है पर क्यों जाना है क्या बाइक से जाना है तुम दोनों  को जाना है । उसके आगे सुनने से पहले में कुछ और नहीं सुन पाया और गाड़ी को आगे बढाया । जिनके वहाँ जाना था उन्ही को फोन मिलाया तब जा कर सही पता पाया । उनके मिलने के बाद मैं कंही और जाने का प्लान बनाया पर नाना जी का प्लान पहले से बना था जो उन्होंने मुझे सुनाया । मैंने भी आज खुद को पक्का भक्त बनने का ख्याब सजाया और नाना जी को बैठा कर फिर वाहन को द्रुत गति से दौड़ाया । आगे फिर रास्ता पूछने का दुस्साहस दोहराया ।
बाद में फिर यही सोचा की मुझे आज ऐसा ख्याल फिर क्यों आया । जनाब को किसी चीज़ की जल्दी नहीं थी उल्टे हमें राय देने में अपना समय बिताया । आपका जहाँ जाना है वो जगह यहाँ से दूर है एक बार और सोच लीजिए । मैंने कहा अब निकल गया हू तो जाना ही है कितने किलोमीटर होगी । २ मिनट मंथन से बाद ५ किलोमीटर मुह से निकला और जाने का सबसे लम्बा रास्ता बताया । गंतव्य स्थल पर जैसे तैसे पंहुचा पर उन सबका आभार व्यक्त करने से डरता हूँ आज बस इतना ही लिखता हूँ । 

Saturday, August 7, 2010

सुबह सुबह शिव के दर्शन, चलती बस में कीर्तन

क्या सोचू क्या लिखू  कभी कभी खुद से यही पूछता हूँ । खुद से कभी कभी । जवाब वही आता है जो लिखें वाला हूँ चुप चाप जो मन में आये लिखे जायदा पका मत
सच में यही वो ख्याल है जब में थोडा ज्यादा ही सोचने लगता हूँ । तो प्रयास कम ही करता हूँ । मैं अपनी रोज ही जिंदगी रोज जी रहा हूँ । रोज कुआँ खोदता हूँ रोज पानी पीता हूँ । क्या मज़े है अपनी पीने का ।

यही सोचता हुआ ऑफिस के लिए रोज घर से निकलता हूँ ।वही बस में पुराने चेहरे , वही टिकेट काटने वाला वही गाते पर खड़े रहने वाला , वही बस की सबसे आगे की सीटों पर रोज बैठने वाली महिलाये(कुछ बालिकाएँ भी) वही रोड वही रास्ते । सोचता हूँ कब तक यूँ ही चलता जाऊंगा, कब जा कर विराम पाउँगा । इस रोज रोज झान्जह्त से कब में मुक्त हो पाउँगा ।

नित कुछ नया करने के उद्देश्य से नेट पर मेल चेक करता हूँ और कुछ नया ना पा कर फिर काम में लग जाता हूँ । काम का भी वही हाल है , मेरे से बुरा उसका हाल है । वो भी मेरे पास आ आ कर थक गया है उसे भी किसी और की दरकार है । बिना बात के काम है काम के काम है उसके बाद थोडा आराम है । पर कभी कभी उस आराम में भी थोडा काम है । और तो और आराम भी एक काम है ।

यही सोचता हूँ और काम कम आराम ज्यादा करता हूँ । चलो थोड़ी बस की बात हो जाये । बात थोड़ी पुरानी है बस में खड़े खड़े सफर कर रहा था की तभी कीर्तन की आवाज़ आई हरे कृष्णा हरे राम राम राम कुछ ऐसा ही था । मुझे ध्यान आया की यार रास्ते में तो ऐसा कोई मंदिर है नहीं जहाँ के भक्त इतने बहकती करने वाले हों । तभी बगल से सरकारी बस का द्रश्य साक्षात् दर्शन हुए और सारे के सारे ख्याल हकिकत में बदल गए । बस के पीछे वाली सीटों पर पूरी की पूरी कीर्तन मंडली बैठी थी । मेरे ख्याल से सरे के सारे एक ही ऑफिस के या एक ही कॉलोनी के रहे होंगे । वो पूरी तरह से तैयार खिलाड़ी लग रहे थे । क्योंकि वो ढोलक , मंजीरे और करताल से सुसज्जित थे । पूरी बस उस कीर्तन का आनंद ले रही थी । और सुनने वाले भी या कहे तो साथ चलने वाले भी । पर बस के अंदर या ये द्रश्य देखें में बड़ा ही अजीब लग रहा था पर आँखों और कानों  को उनके कीर्तन सुकून बड़े दे रहे थे । और अंदर से एक ही पुकार आ रही थी की चलो कम से कम दिल्ली जैसे शहर में ऐसा नज़ारा देखा जहाँ पर शायद दर्शन उनके दुर्लभ होते हैं जैसे दिल्ली में हैंडपंप । दुर्लभ से मेरा मतलब मंदिर से नहीं इंसानियत से है । मुझे उन भक्त जानो पर बहुत ही जायदा खुशी हुई की कैसे उन्होंने समय का सदुपयोग किया । आज कल के समय में हमें पूजा पाठ करने का टाइम नहीं होता । मैं बस से देखता हूँ की बहुत लोग कार के अंदर ही पूजा करते हैं । जूते उतार कर कार में ही हनुमान चालीसा या जो भी उनके इष्ट देव हो उनको याद कर लेते हैं । बड़े शहर में हर कोई समय का सदुपयोग करने में लगा है । कोई अखबार ले कर ही सुबह शौचालय में चला जाता है पूछो तो कहता है यार अंदर क्या करूँगा इसी बहाने अखबार भी पढ़ लूँगा। समय भी बचेगा मुझे ये समझ में नहीं अत है की एक साथ दो काम कैसे कर लेते हैं लोग वो भी निहांत एकाग्रता वाली जगह पर जन्हा पर कोई आवाज़ भी दे दे तो पूरी की पूरी मेहनत बेकार हो जाटी है । और नए सिरे से प्रयास करने होते है । अरे क्षमा चौंगा की बस की बात से पता नहीं कहाँ खस पे चला गया ।