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Thursday, September 30, 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स के चक्कर में, लड़का शिकार हो गया लड़की की टक्कर में

कॉमनवेल्थ गेम्स से सरकार को उतना फायदा नहीं मिला होगा जितना कष्ट आम जनता को हुआ होगा  बसों की हालत खराब है यात्री बेहाल हैं और सरकार लाइलाज है । जैसे जैसे कॉमनवेल्थ गेम्स की तारिख पास आ रही है वैसे वैसे आम लोंगो की दिक्कत बढती जा रही है । हालाँकि इसके दूरगामी परिणाम अच्छे होंगे पर अभी तो लंका लगी हुई है ना । बाद का क्या हम हो न हो दिल्ली सवर गई तो क्या, हमें तो कष्ट हो रहा है ना ।  ऐसा कई लोग बार बार लगातार सोचते हैं न जाने दिन में कई बार पर कर कुछ नहीं पाते ।

कॉमनवेल्थ गेम्स के कारण ब्लू लाइन बसों को बंद करा दिया है और सरकारी बस सरकार की तरह सुस्त और फुस्स है ।  कब चले और कब रुके कुछ पता नहीं। जो बड़ी बस आयीं है वो भर जाने पर इस तरह से चलती है की पूछो मत ।  उनमे जगह कम और भोकाल ज्यादा है ।  खैर उनके इंतज़ार में न जाने कितनी देर खड़ा होता हूँ स्टैंड पर, पर वो नहीं आती बस उसकी आस आती है और आस पे साँस चलती है और साँस को थाम कर में किसी भी बस में चढ़ जाता हूँ जो मेरे गंतव्य स्थल पर जाती हैं और दिन की शुरुवात बस में धक्के खाने के साथ करता हूँ ।

और आज कल अंत भी उसी के साथ करता हूँ क्योंकि वापसी में बस तो नदारद रहती है । बस स्टैंड पर भीढ़ इतनी की ना जाने कहाँ से 5-6 खोमचे वाले रोज कुछ न कुछ बेचते नज़र आते हैं और सच मानिये स्टैंड पर खड़े लोगों से ज्यादा भूखे लोग मैंने कभी नहीं देखे । खोमचे वालों का सब कुछ खत्म कर देते हैं ।  हम लोगो को यात्रा के नाम पर बहुत भूख लगती है । मैंने देखा है कितनी भी महगाई आये पर खाने के सामान में कोई कमी नहीं होती जो चीज़ जितनी महगी होती है वो उतनी ज्यादा बिकती है और खाते हुए हम सरकार की न जाने कितनी पुश्ते गिन जाते हैं ।

रात में ऑफिस से घर जाते वक्त किसी तरह घर जाने की जिद होती है पर इसमें कोई कोई हमसे भी ज्यादा जिद्दी होते हैं । मसलन कल एक जनाब मिले वो शाम के 6 बजे से एक विशेष नंबर की बस के इंतज़ार में खड़े थे और जब में स्टैंड पर पंहुचा तो 8 बज चुके थे । पर वो जनाब किसी और बस में जाने के बजाए उसी के इंतज़ार में थे उनके बस का नंबर और मेरे बस का नंबर एक ही था तो मैं हालत समझ गया और अपनी यात्रा टुकड़ों में करने की सोची और घर जाने के सीधे क्रम को 3 हिस्सों में बाँट दिया ।
पहला हिस्सा 4 किलोमीटर का था जो कम देर चला और बस से उतर कर दूसरे क्रम की बस में चढ़ गया । बस में सवारी इस कदर भरी हुई थी जैसे बोरी में चीनी भर के हिला दिया गया हो और फिर से चीनी डालने की तैयारी हो बस जब स्टॉप पर रूकती थी तो हर कोई यही मनाता था की बहुत लोग उतरे और कोई न चढ़े । बस फिर से चली पर रुक गई देखा एक सामान्य कदकाठी की लड़की एक लड़के को बेतहाशा रूप से मार रही थी । वो दोनों उसी बस से उतरे थे जिसमे में था । मुझे लड़की की फुर्ती देख कर बड़ा अचम्भा हुआ उसने कोई 5 सेकेंड में 10 तमाचे मार दिए होंगे जिसकी मुझे क्या उस लड़के को भी उम्मीद नहीं होगी उसके बाद तो हीरो की लिस्ट बड़ी लंबी होती गई सब उसकी मदद में हीरो बनने के लिए आगे आ गए । लोगो का कहना था की लड़की को टक्कर लग गई थी लड़के से, बेचारा बिना बात के कॉमनवेल्थ गेम्स का शिकार हो गया और बस आगे बढ़ गई ।  

Thursday, September 23, 2010

बस में भीड़ और विज्ञापन का असर साथ में कॉमन वेल्थ फ्री




आज कल जिधर देखो खुदा ही खुदा है, मैं दिल्ली के रास्तों की बात कर रहा हूँ । आप जिधर देख लो हर तरफ खुदा है और उसमे पानी भरा हुआ है और साथ में वो मच्छर प्रजनन स्थल बने हैं । और उन्हें मीडिया बड़ी ही तन्मंता के साथ दिखा रहा है । मैं भी कभी कभी मान बहलाने के लिए इंडिया टीवी देख लेता हूँ और मीडिया की हरकतों पर  मुस्कुरा लेता हूँ । पर क्या करे अगर, अगर क्या इतना पानी है की मगर भी रह जाये तो किसी को पता नहीं चलेगा । कोई भी दिल्ली वासी का पेट तब तक नहीं भरता होगा जब तक वो कॉमन वेल्थ वालों के खानदान को अपनी जवाब पर ना लाता हो । घर का पानी ना आये तो कॉमन वेल्थ की बीप बीप, पंचर भी होता है तो मैं कईओं को कॉमन वेल्थ की बीप बीप करते देखा है । अरे भाई उसमे वेल्थ वालों की क्या गलती वो तो बस अपना काम कर रहे हैं । आजकल हर जगह कॉमन वेल्थ की ही चर्चा है । मेरा एक रिश्तेदार भी इसका हिस्सा है और वो बड़ा प्रसन्न है क्योंकि उसे उपर से नीचे तक रीबोक के बस्त्रों से सजाया गया है ।

मेरा भी पाला कॉमन वेल्थ से होने वाली परेशानिओं से पड़ा है क्योंकि में बस का नियमित सवारी हूँ और कॉमन वेल्थ की वजह से मुझे भी या मेरे जैसे कई नियमित लोगों को परेशानी हुई है । मसलन कभी एक नया रूट बना देना कभी किसी नए रास्ते पे ले जाना । देर से ऑफिस पहुचों तो रोज नई बात बताने से ऑफिस वालों का भी शक होना की बालक रोज लेट होता है और कहानी भी नई बनाता है या तो ये बहुत क्रिएटिव है या बहुत ही बड़ा कहानीकार । पर सच तो ये है की सच वही जनता है जो बस का सफर करते हैं, हमारी पीड़ा वो क्या जाने जो खुद के वाहन या कार से आते हैं ।

वो तो जहाँ खड़े हो जाये वंही पर एफम ऑन और फोन पे लगे बतियाने । पर बस वाले क्या करे एक तो बस में भीड़ उस पर से खड़े खड़े सफर और अगर बस में आप अपने पैसे खर्च कर के भी बात करेंगे तो भी कई लोग टोक देते हैं की भाई साहब बस में तो अराम करने दिया करो फिर तो दिन भर फोन पर ही बात करना है । ये हैं बस के हालात । कुछ लड़किओं को मैंने देखा है उनके मुंह में साईंलेंसर लगा होता है कितना भी ध्यान लगा लीजिए मजाल की आप उनकी बात सुन सके ।

अब कल की ही बात है सुबह का समय था हर कोई भागने में, और बस पकड़ने में लगा हुआ था । मैं भी भीढ़ का एक हिस्सा था । बरसात का ये किस्सा था । जब से बस में फोन चोरी हुआ तब से ब्लूलाइन की सवारी से बचता हूँ, थोड़ा अराम से बस पकड़ता हूँ । एक सरकारी गाडी आई वो भी पूरी ठसाठस भरी हुई । किसी तरह उसकी बालकॉनी वाली सीट ( ड्राईवर के बगल वाली क्योंकि यही वो स्थान है जिसे पूरी बस दिखाई देती है तभी में इसे बालकॉनी वाली सीट बोलता हूँ ) पर जगह मिली । और मैं ड्राईवर साब से बाते करता हुआ सफर को अंजाम देने लगा । अभी बस अपनी रफ़्तार पर थी की अचानक किसी महिला के शोर की आवाज़ आई, आवाज़ का जब ठीक से अध्ययन किया तो पता चला की कोई नवयुवती होगी । उसके साथ उसका कोई पुरुष मित्र भी था । उसके बाद तो अगले १५ मिनट तक सिर्फ हो हल्ला ही होता रहा बात क्या थी पल्ले ही नहीं पड़ रही थी । हम भी ड्राईवर साब के साथ मगन थे । एक जनाब जब पीछे से आगे तो मैं बड़े प्रेम से पूछा क्या मैटर था, तो जनाब बोले भाईसाब बस में इतनी भीढ़ है  गलती से किसी ने एक नवयुवती को छू दिया होगा तो उस पर उनके पुरुष मित्र तो ताव आ गया । तो पूरा मुद्दा मेरे समझ में आ गया । वैसे भी आज कल रेडियो और टीवी में नया विज्ञापन बड़ा चल रहा है की वो प्यार ही क्या जो आपकी रक्षा ना कर सके गुनाहों का देवता । चलो कम से कम विज्ञापन का असर इतनी तेज़ी से होता है ये मैंने बहुत दिनों के बाद देखा था । मैं भी अपने स्टॉप से ऑफिस के लिए निकाल पड़ा ।   

Thursday, September 16, 2010

चन्द्र शेखर आज़ाद को समर्पित एक कविता

आज कुछ लिखने का नहीं बल्कि गुनगुनाने का मन किया तो सहसा ही पता नहीं कहाँ से चंद्रशेखर आज़ाद याद आ गए और उनपर मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी है उनको आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ आशा है आपको पसंद आएगी


देश को आज़ाद कराने,
की ज़िद जिसने ठानी थी
उठा कर बन्दूक चलाकर कर गोली,
लिखनी नयी कहानी थी
भगत बिस्मिल के साथ,
ना जाने कितनी खाक छानी थी
कभी इस शहर कभी उस गाँव में,
जीवन जीना जिसकी निशानी थी
मार खाते हुए नाम आज़ाद
बताना उनकी साहस बयानी थी
पहन कर साधू का चोला
चकमा देना पुलिस को भी हैरानी थी
बाग में जब खुद को घिरा पाया
तो आखिरी गोली खुद पर चलानी थी
आज़ाद हुआ जीवन से आज़ाद जब
पूरे देश में ये चर्चा जुबानी थी  
© विपुल चौधरी