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Tuesday, July 5, 2011

कौन हूँ मैं ?


कौन हूँ मैं,
जानता नहीं हूँ,
अँधेरे गर्भ से निकला,
महीनों तक पला,
नाल से किसी से था जुड़ा,
क्यों हुई उत्पत्ति मेरी,
अंजान था मैं, बेखबर
जब प्रकाश ने छुआ मुझे,
ऑंखें हुई छुईमुई,
जुदा कर दिया नाल से मुझे,
फिर भी अंजान रहा बरसों तक,
कौन हूँ मैं ?
,, ब से गुनगुनाता हुआ,
अपनी ही आवाज़ से खुश होता रहा,
तब ना खुद को जानने की समझ थी,
न ही खुद को जानने की ईच्छा,
वक्त के साथ सोचता गया,
कौन हूँ मैं ?
जब हुआ बड़ा,
सोचा अब जानूंगा खुद को,
तब कोई आया जीवन में ऐसा,
जिसने कहा बड़े प्यार से,
जानती हूँ मैं तुम्हे, तुझसे बेहतर
मैंने भी खुद जानने के लिए उसी को सहारा बनाया,
जब भी जानना होता खुद को,
पहुँच जाता उस डगर,
एक दिन वो छोड़ कर चली,
रह गया अकेला तनहा उदास ,
एक बार फिर लग गया जानने में,
कौन हूँ मैं ?
छोड़ कर सब कुछ जीने लगा जिंदगी,
वक्त के साथ लोग गुजरते
कुछ पुराने टूटे तो नए बनते गए,
कोई टूट कर भी जुड़ा रहा, कोई जुड कर भी टूटा रहा,
जिंदगी की इतनी आपाधापी में
खुद को मैंने जाना है,
जीवन जीने आया हूँ, जीवन जी के जाना है,
यही सार है जीवन
यही हूँ मैं ..
फिर भी तलाश मेरी अधूरी सी लगती है...........
खुद को जानने की कसक आज भी दिल में रहती है .....

Wednesday, June 15, 2011

मेट्रो में मैराथन


ये दिल्ली है मेरी जान ! जानते हो क्यूँ ? क्योंकि यहां दिल वालों की मंडली रहती है । हर कोई दिल देने और दिल लेने में लगा हुआ है । कमी है बस तो एक कि टाइम नहीं है किसी के पास और अगर है तो फिर खूब सारा फिर  तक जब तक आप उससे उब नहीं जाते आप उसे छोड़ नहीं सकते । मगर दिल्ली में सब कुछ तेज दौड़ता है, तेज रफ़्तार गाड़ी, उसमें बैठी सवारी, बस और तो और मेट्रो भी दौड़ती है बड़ी तेज ।  
दिल्ली हमेशा से ही नए-नए बदलाव का मुरीद है पर दिल्ली में पिछले कुछ सालों में बड़ी तेज़ी से बदलाव आया है । जब कॉमनवेल्थ गेम्स दिल्ली में होने का हुआ तो बहुत के समझ में आ गया की दिल्ली अब सच में बदलेगी । नई नई बसें, स्टेडियम, गमले, फूल और मिटटी तक बदल दी गयी दिल्ली की और देखते देखते दिल्ली रहने वालों के लिए कहीं स्वर्ग तो कहीं नरक और बाहर वालों के लिए एक सपना हो गयी ।  चीजें महंगी होती गयी और लाइफ सस्ती । जिन्हें कमाना था वो कमा गए जो बच गए वो बचा खुचा समेटते हुए निकल गए । रही सही कसर या यूँ कहें की इज्ज़त बचायी तो भारतीय खिलाड़ियों ने जिन्होंने खूब सारे ईनाम जीते और देश का नाम रोशन किया और मुझे लगता है उसके बाद दिल्ली वालों को खेल की हवा लग गयी है । पूरी दिल्ली खेलनुमा हो गयी ।
लोगों ने खेलों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और दिखा दिया की दिल्ली वालों का दिल प्यार के लिए ही नहीं  ही नहीं मैच के लिए भी बड़ा है । खैर खेल खत्म हुआ और शुरू हुआ उसके बाद खेल के बाद का खेल ।
आज कल खेल में एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है वो है मैराथन का । जब देखो तब कोई ना कोई मैराथन करवाता है और लोग उसमें शामिल होते हैं सन्डे के सन्डे और दौड की दौड़ हो जाती है और कोई गंभीरता से दौड़ गया तो ईनाम अलग से । उसमें उम्र दराज़ से ले कर बच्चे तक शामिल होते हैं ।  मैराथन को एक शानदार सन्डे बनाते है पर ये साल में कभी या एक साथ कई जगह पर होती है, एक दिन छोड़ कार एक दिन. मेट्रो में भी ऐसा ही खेल होता है छोटी मैराथन के नाम से हर रोज । ये अलग बात है की कोई उस पर गौर नहीं करता ।
जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ मेट्रो की जहां रोज छोटी मैराथन होती है । सच मानिए अगर आप मेट्रो में १०० मीटर की रेस का आयोजन करेंगे तो कोई भारतीय ही जीतेगा । बस शर्त ये है की रेस मेट्रो ट्रेन के गेट खुलते ही चालू होगी और मेट्रो के बाहर निकलने वाले गेट तक खत्म होनी है । क्योंकि दिल्ली के बहुत से लोग बाथरूम में १५ मिनट ज्यादा लगा सकते हैं पर मेट्रो के गेट खुलने के बाद वो १० सेकंड भी मेट्रो स्टेशन पर बिताना पसंद नहीं करते । और गेट खुलते ही ऐसे भागते हैं जैसे गेट खुलने पर रेस के घोड़े भागते हैं । पर जैसे ही वो मेट्रो स्टेशन का गेट पार करते हैं वो अपनी सारी फुर्ती फिर मेट्रो की लिफ्ट को पकड़ने में लगा देते हैं । जैसे मैराथन खत्म होने के ईनाम के रूप में उन्हें मिला हो । मेट्रो की लिफ्ट में चढ़ने का मौका इसे क्यों पाना । मुझे ये समझ में नहीं आता कि लिफ्ट का प्रयोग जवान लोग क्यों करते हैं. मैंने कई उम्रदराज लोगों को देखा है कि वो सीढ़ियों का प्रयोग करते हैं. कभी कभी तो पूरी लिफ्ट हट्टे कट्टे पुरुष और महिलाओं से भरी होती है और उम्रदराज लोग बाहर खड़े रहते हैं पर मजाल है कोई लिफ्ट से उतरे. क्योंकि उन्होंने १०० मीटर कि मैराथन में ईनाम जो जीता है लिफ्ट से जाने का लाइसेंस । 

Friday, May 27, 2011

इश्क-विश्क और फेसबुक

मेट्रो अपने एक तरह की माया नगरी है जहां हर कोई कलाकार है और वही उसका निर्देशक है. हर रोज एक नई फिल्म लिखी जाती है और उस पर काम होता है । जिसमे मेट्रो एक बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल निभाता है । क्योंकि मेट्रो प्यार की नई फ़सल वालों के लिए सबसे अच्छे अड्डे बनते जा रहे हैं । कन्धों पर बैग के साथ में दिल में तमाम सपनों को लिए ये रोज मेट्रो में सवार होते हैं और निकल पड़ते है एक नई मंजिल की तरफ । मेट्रो के एसी कोच की हवा खाते और खुद को बस की गर्मी में लू से बचाते, सीढियों पर बैठ पर घन्टों बतियाते , हर रोज नए सपनों को बुनते है । 

ये नज़ारा मेट्रो के हर स्टेशन का है, जहां पर बड़े आराम से ऐसा देख सकते हैं । मेट्रो स्टेशन की सीढियों पर आधे से ज्यादा जगह पर इनका कब्ज़ा होता है और इनको किसी और की कोई फिक्र नहीं होती. बस फिक्र होती है तो अपने प्यार की । 
जब ये सीढ़ियों से निकल कार मेट्रो के डिब्बे में जाते हैं तो इश्क का बुखार वहां भी कम नहीं होता, कोई किसी को ले कर सीट पर ऐसे बैठता है जैसे दिन दुनिया में उसे देखने वाला कोई नहीं है । तो कोई खड़े खड़े ही इश्क की इबादते पढ़ने लगता है । आज कल एक नया ट्रेंड देखने को आया है पहले लोग इधर-उधर की या पड़ोस में रहने वाले / वाली की बात करते थे आज कल फेसबुक का जमाना है हर कोई फेसबुक की बात करता है । और बाखुदा अगर वो इस बला वेबसाइट से नहीं जुडा हुआ है तो आपको ऐसे देखेंगे जैसे अपने घोर पाप कर दिया है । आप ज़िल्लत से बचने के लिए घर जाते ही जुड जाते है और अगले दिन अपडेट करते है I m on Facebook. फिर सिलसिला शुरू होता है दोस्ती का और फेसबुक से मोहब्बत का । 


कुछ ऐसा ही नज़ारा, कुछ दिन पहले मेट्रो में देखने को मिला । एक लड़का और लड़की बड़े आराम से बात कर रहे थे पता नहीं किधर से बात फेसबुक पर आ कर रुक गयी । फिर क्या था लड़का पहले लड़की को समझा रहा था कि किसी अंजान को add मत किया करो, सबसे बात मत किया करो, ये फेसबुक अच्छी चीज़ नहीं है । लड़की बड़ी देर तक सुनती रही जब उसका मन भर गया तो उसने शुरू किया की, तुमने फेसबुक पर 2 अलग अलग नाम से प्रोफाइल क्यों बना रखी है, तुम रोज नई-नई लड़कियां को फ्रेंड बनाते हो मैंने कभी कहा । अब तो लड़के का चेहरा देखने वाला था । उसने बोला how you know ?? लड़की बड़े प्यार से बोली की जिस जुली को कल तुमने अपना नंबर दिया ना वो मैं ही थी । अब तो लड़का शर्मशार हुआ जा रहा था । पर जैसे चोट खायी हुई नागिन अपना बदला लेती ही है उसी तरह गर्ल फ्रेंड से चोट खाया बॉय फ्रेंड बदला जरूर लेता है । वो भी लड़की पर बरस गया की, मुझे पहले ही शक था की तुम ऐसा करती हो और तुम्हे ही पकड़ने के लिए मैंने ऐसा किया था । जब ये सुना तो मेरी हँसी नहीं रुकी । तभी किसी लड़के का फोन आया ... लड़के ने पूछा कौन था ? लड़की बोली फेसबुक फ्रेंड है । अब तो लड़के का पारा 104 पर था । फिर क्या क्या तू-तू मैं-मैं होती रही । इतिहास में की गयी कोई भी गलती का आज हिसाब-किताब और कच्चा चिटठा खुलता गया, एक-एक कर के । कभी लड़की शर्मिंदा होती तो कभी लड़का । खैर ऐसा करीब 45 मिनट तक चला होगा । फिर दोनों फेसबुक पर बहस करते करते उतर गए । 



मुझे लगता है फेसबुक आज कल चर्चा का मुद्दा है । जहां 4 लोग जुटते है वहीँ उसकी चर्चा होती है । वैसे मैं भी इससे अजीज आने वाला हूँ पर क्या करू 70फैन्स है ........