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Monday, December 19, 2011

मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम


मुझे याद नहीं मैंने फ़िल्में देखना कब शुरू किया, हाँ इतना जरुर याद है की देखी बहुत सी फ़िल्में हैं. पहले आज की तरह 24 घंटे का चैनल नहीं हुआ करते थे.एक मात्र देखने का जरिया दूरदर्शन हुआ करता था. जोकि हफ्ते में 2 बार फिल्मे देता था शनिवार और रविवार. पर हम लोगों के पास एक और भी जरिया था वो था वीडियो. जो अकसर हम किराये पर लाते थे. जिस समय किराये पर वीडियो लाने का चलन था उस समय वीडियो वाले की बड़ी चाँदी हुआ करती थी. वीडियो देने से पहले वो 4-5 हितायतें देता साथ ही वीडियो कैसट ना छूने की सलाह देता. हम सब कुछ हाँ में कहते और ले कर चले आते.

उस समय 3-4 स्टार अपने टॉप पर थे. मिथुन, गोविंदा, अमिताभ और जितेंदर उनमे से कुछ नाम है. हम पूरी रात के लिए विडियो किराये पर लेते थे. वैसे मेरा मोहल्ला था तो बहुत बड़ा पर हमारी बोलचाल कम से थी, और उतना ही कम आने-जाना व्यव्हार. सिर्फ कुछ ही परिवार थे जिनके घर आना जाना होता था. तो जब घर में वीडियो लाया जाता तो उनको बुला लिया जाता और घर में एक छोटी-मोटी पार्टी का माहौल होता. चूँकि हम छोटे थे तो बड़ा मजा आता की घर पर खूब सारे लोग है. उपर से पढ़ने का कोई इरादा नहीं तो खुशी से खुशी दुगनी हो जाती थी. इन सब के बीच जो सबसे बड़ी समस्या होती कि कौन-कौन सी फिल्मे आनी है. उस समय जो चल रही होती वो तो आती ही, फिर होती दूसरी और तीसरी फिल्म कौन सी होगी. यह समस्या उस रात से 2-3 दिन पहले तक होती. अच्छा हम लोग हल्ला भी ज्यादा नहीं कर सकते थे क्योंकि डर भी लगता कहीं घरवाले भी ना डांटे और वीडियो लाने का प्रोग्राम ही रद्द ना कर दें. तो सारा काम बड़े ही चतुराई से करना होता था. आखिर में सब मिला जुला कर 2 नई फिल्मे और एक थोड़ी पुरानी फिल्म लाने का फैसला होता. बड़ों का भी ख्याल रखना पड़ता था.

फ़िल्में खाने-पीने के बाद लगभग 9 बजे शुरू होती. उस दिन खाना भी फिल्म के चक्कर में जल्दी हो जाता. हम सभी को खाने पीने में मन नहीं लगता क्योंकि अंदर से खुशी तो फ़िल्में देखने की होती और खाना पेट में जाता ही नहीं. घरवाले जैसे-तैसे करके खाना खिलवाते और फिर टीवी के आगे मंडली जम जाती. वीडियो वाला भी रात में हम ही लोगों के साथ टीवी  देखता क्योंकि उसे लगता की कहीं कोई गडबड हो गयी तो क्या होगा. इसलिए वो अपने एक जूनियर को भेजता. ना जाने कितनी तार लगाने के बाद तो VCR चलता. उसके तार लगाने के साथ ही हम सब कैसट चेक करते-करते वीडियो वाले की तरफ देखते कहीं वो देख तो नहीं रहा.

फिर वीडियो शुरू हो जाता. मुझे याद है हर वीडियो चलने के पहले एक अजीब से धुंधली लाइन आती. कुछ दिनों बाद हमे भी पता चल चलने लगा कि वीडियो अच्छा है या बुरा. मेरा मतलब प्रिंट से था, और हम पहले से बोलने लगते भईया ये कैसट खराब है बदल कर लाओ. जब भी ऐसा होता तो वीडियो वाला पता नहीं VCR के किस-किस हिस्से में फूँक मरता और वीडियो सही  चलने लगता. हमें वो वीडियो वाला उस दिन बड़ा चमत्कारी लगता और सोचते की बड़े होकर में भी वीडियो वाला ही बनूँगा. पर अगले ही पल ये सारे विचार रद्द कर के फिल्म देखने में लग जाता. मुझे फिल्मों में हीरो के साथ-साथ विलेन भी बड़े अच्छे लगते. खैर पहले जब छोटा था तो सब बराबर ही लगते पर जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो लगता की विलेन अगर विलेन नहीं होता तो किसी हीरो से कम नहीं होता. क्योंकि हर परेशानी हीरो को ही होती है खलनायक मजे करता है. सुर, सुरा और हीरोईन से कहीं से भी कम न दिखने वाली वैम्प जो उसके साथ रहती. इतना ही नहीं वो लड़की(वैम्प) उसके लिए किसी स्तर तक जाने को तैयार रहती. वहीँ हीरो को पता नहीं क्या क्या करना पड़ता था. गाना गाने से लेकर, नौकरी करना, धक्के खाना, उसके पापा से शादी की बात करना इत्यादि. मैं कभी कभी सोचता की यार हीरो से अच्छा तो विलेन ही होता है. उसे सब कुछ पहले से मिला होता है. और वो हीरो से ज्यादा पॉवरफुल होता है. मुझे भारतीय फिल्म इतिहास के विलेन में कुछ बहुत ही खास और अच्छे लगते हैं/थे. एक तो सदाबहार अमरीशपुरी, फिर उनके छोटे भाई मदनपुरी. मुझे मदनपुरी की बन्दूक पकड़ने की अदा बड़ी अच्छी लगती थी. साथ एक और थे जो बन्दूक बड़ी अदा से पकड़ते थे वो थे K.N Singh. मुझे याद है संजय दत्त की एक फिल्म थी सड़क. जिसे में 1 हफ्ते में कोई 10 बार देखी होगी कारण सिर्फ सदाशिव अमरापुरकर थे. क्या एक्टिंग करी थी उन्होंने उस फिल्म में. मुझे आज भी विलेन हीरो से अच्छे हो लगते है. पुराने फिल्मों में एक बड़ी अजीब आवाज़ आती जब हीरो और विलेन के बीच लड़ाई होती वो होती थी मुंह से निकलने वाली आवाज़ ढिशुम-ढिशुम. ये बात मुझे मेरे पिता जी ने बताई क्योंकि मुझे लगता था की यह आवाज़ सच में निकलती है जब किसी दो लोगों के बीच हाथापाई होती है तो. आज उन आवाज़ हो किसी फिल्मों में सुनता हूँ तो हँसी सिर्फ चेहरे पर नहीं दिल में भी होती है.

कुछ ऐसा ही मंजर मुझे मेट्रो में देखने को मिला. मैं अपनी सीट पर बैठा किताब पढ़ रहा था तभी मुझसे अगले गेट के पास से 2 लोगों के झगडे की आवाज़ आयी. दोनों सीट को लेकर झगडा कर रहे थे. हुआ ये था की एक जनाब बैठे थे और एक जनाब खड़े थे. जो जनाब खड़े थे उनको बार–बार पैर लग रहा था. कैसे ये नहीं पता. बस उसी बात पर झगडा हो रहा था. तभी इन दोनों के बीच एक जनाब बीच-बचाव करने के लिए कूद पड़े. जो जनाब खड़े थे अब वो बैठे वाले को छोड़ कर बीच-बचाव करने वाले पर ही उल्टा सवार हो गए. दोनों की बातों में जमीन आसमान का अंतर था क्योंकि जो खड़ा हुआ आदमी था वो ऑक्सफोर्ड का पढ़ा हुआ लगता था और दूसरा हरियाणा के एक सरकारी स्कूल वाला. कुछ देर तक वैसे ही बकझक होती रही. और अचानक सन्नाटा छा गया. ये तूफ़ान के पहले की ख़ामोशी थी. फिर अचानक इस सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज़ आयी. ढिशुम-ढिशुम. हर कोई उधर ही देखने में लग गया. हरयाणवी ने अपना जलवा दिखा दिया और ऑक्सफोर्ड वाले को मेट्रो में तारे दिखा दिए. मुझे भी ऐसी उम्मीद नहीं थी. पर ऐसा हो गया. उसके अगले स्टेशन पर ऑक्सफोर्ड और हरियाणा वाले मेट्रो के नीचे थे.

Tuesday, November 8, 2011

पहचान कौन ?


अक्सर रात में जब ऑफिस से लेट घर जाता हूँ तो घर पहुच कर बड़ा अजीब लगता है. क्योंकि मेरी माता श्री को छोड़ कर सब सो चुके होते हैं. आपके पास किसी से बात करने का समय नहीं होता. सबसे बड़ी बात होती है कि कभी-कभी मेरा भतीजा जिसे रात में सुलाने के लिए नाकों चने चबाना पड़ते हैं, वो भी मेरा इंतज़ार करता है. और अपनी तोतली आवाज़ में पूछता है ओफिज से आए हो. खाना नहीं खाओगे. मेरे मना करने पर थोड़ी देर मेरे साथ बात करते-करते धीरे-धीरे सो जाता है. फिर मैं अपनी सालों पुरानी पर अब तक ना पड़ने वाली आदत से मजबूर टीवी देखने लगता हूँ. मुझे रात में टीवी देखना थोड़ा ज्यादा पसंद है. क्योंकि आप बिना किसी रोक टोक के चैनल बदल-बदल कर देख सकते हैं.  पर रात में एक समस्या भी होती है वो है जब आप चैनल बदलते हैं तो कमरा लाइट से भर जाता है और फिर नए चैनल से फिर अँधेरा हो जाता है. रात में अंग्रेजी-हिंदी फिल्मों के साथ-साथ एक सबसे अच्छी चीज़ आती है वो है टेली शॉपिंग नेटवर्क. यह आपको दुनिया की नायाब से नायाब चीजें सबसे सस्ती और टिकाऊ तरह से बेचते हैं फिर वो चाहे सोफा हो या नज़र यन्त्र या फिर चवनप्राश का दादा पॉवरप्राश.  इसके साथ एक और चीज़ आती है जो मुझे सबसे अच्छी लगती है उसका नाम है पहचान कौन? ये नाम मैंने दिया है. कारण है इसमें २ चेहरों को एक साथ मिला दिया जाता है और फिर पब्लिक से पूछा जाता है अगर आप दोनों चेहरों को पहचान चुके हैं तो अभी कॉल करिये, आप जीत सकते हैं 50000 तक ईनाम.अभी कॉल करिये.

इसमे कई बार क्या, हर बार इतने आसान और बड़े-बड़े लोगों या फिल्म स्टार के चेहरे लगाए जाते हैं कि अंधा भी पहचान ले. पर मजाल है पब्लिक का कोई बन्दा उन्हें पहचान पाए. अगर सलमान और शाहरुख खान की पिक्चर है तो लोग फोन करके कहते हैं कि आमिर खान या संजय दत्त. तब एंकर उनको बड़े प्यार से कहतें है आप बहुत करीब पहुच गए थे पर अफ़सोस ये गलत जवाब है. जल्दी से फोन करिये. फिर अगला कॉल आता है वो कहेगा अमिताभ बच्चन. फिर क्या! सुनते ही हँसी निकल जाती है. जब आप उनको कॉल करते हैं तो 10 रू प्रति मिनट का खर्चा आता है. ये बात शायद मेरे एक पड़ोसी की पत्नी को नहीं पता थी. उसको लगा कि इतना आसान सा सवाल है अगर वो बता दे तो 50000 उसके हो जायेंगे यही सोच कर उसने कॉल कर दिया. इसके बाद तो जैसे अजगर अपने शिकार को फंसाता है वैसे ही कंपनी ग्राहक को उसमे फसाती चली जाती है. और ग्राहक को पता ही नहीं चलता कि वो 10 रु प्रति मिनट से अपनी भी पैर पर कुल्हाड़ी चला रहा है. और उसे कुछ नहीं मिल रहा है. क्योंकि फोन पर वो सिर्फ अपना नाम, पता और पता नहीं क्या क्या नोट करा रहा होता है जो कि कछुआ चाल से होता है.

कुछ देर बाद पता चलता है किसी ने एक एक्टर का नाम सही-सही बता दिया पर दूसरा नहीं बता पा रहा है. फिर क्या ईनाम कि राशि बढ़ जाती है. उधर कॉल करने वाली कि धड़कन बढ़ जाती है कि ईनाम उसको मिलेगा या नहीं. आखिर में ना जाने कितने मिनट कि जद्दोजहद के बाद उसे पता चलता है कि उसे लूट लिया गया.

खैर ये तो था मेरा अनुभव, सच मानिए उस प्रोग्राम देखते वक्त में सबसे ज्यादा हँसता हूँ. ये पहचानने का खेल कभी-कभी मेट्रो में भी होता है. जब आप रोज मेट्रो में सफर करते हैं, तो आपको कुछ चेहरे हर रोज दिखाई देते हैं. और जब आप अलग-अलग समय पर यात्रा करते हैं तो आपको सारे चेहरे एक जैसे लगते हैं. और कभी-कभी लगता है इसको कहीं देखा है. वैसे मेरे साथ एक दो बार ऐसा हुआ कि मुझे मेरे साथ मेट्रो में चलने वाले मार्केट में दिखाई दिए, मैं सर पकड़ कर बैठ गया कि इसको किधर देखा है, किधर? दिमाग में सारे तीर चलाने के बाद पता चलता है, अरे ये तो मेट्रो में दिखा था. फिर क्या, लग जाता हूँ अपनी शॉपिंग करने में यही सोच कर कि अब कोई नया चेहरा दिखे, जो मुझे याद ना हो. 

Tuesday, November 1, 2011

रघु, राम और रोडीज


रविवार की रात का कोई 12 बजा होगा, आखों से नींद कोसों दूर थी और लगता भी नहीं की जल्दी नींद आने वाली थी, क्योंकि कल मेरी मुलाकात उन लोगों से होनी थी जो आज देश में अपना एक मुकाम रखते हैं. पिछले कुछ सालों से उन्हें लगातार टीवी पर देख रहा हूँ, यदा-कदा टिप्पणी भी
करता था पर अपने दिल में ही रखता या फिर सिर्फ करीब के मित्रों से ही बात करता. उनकी कहानी भी कोई १० साल पुरानी है. जीरो से हीरो का सफर हमेशा कितना सुखद होता है. ये शायद उनसे बेहतर कोई नहीं जानता. उनके विकराल कठोर चेहरों ने कार्यक्रम (प्रोग्राम) को एक नया रूप दिया. और उन्हें एक नए ही रूप में पेश किया. उन्होंने एक साधारण से प्रोग्राम को एक नए आयाम पर पंहुचा दिया. मैं वक्त से पहले ही जाग गया. ऐसा मेरे साथ अकसर नहीं होता था. सारे काम निपटा कर मैं audition  वाली जगह पर करीब 10 बजे पंहुचा तो कम से कम 5 हजार से ज्यादा लड़के और लड़कियां लाइन लगाए हुए गेट के बाहर खड़े थे. उनमे जोश कूट-कूट कर भरा हुआ था. कोई भी हटने का नाम नहीं ले रहा था. धूप भी उनकी परीक्षा लेने में लगा हुआ और उनके इस इम्तिहान को और कठिन बना रहा था पर सारे भावी रोडीज डटे हुए थे अपनी राहों में. उन्हें ना धूप कि परवाह थी ना पानी की, उन्हें तो सिर्फ परवाह थी रोडीज की. मैन गेट के बाद जब हम अंदर पंहुचे तो बाहर से ज्यादा भीड़ अंदर थी. बैरीकेडिंग उनको रोकने के बनी थी जो उन्हें रोक पाने में बेकार थी. स्टेज पर तरह-तरह के Engaging प्रोग्राम चल रहे थे. उसके बाद उनको उपहार बाँटें जा रहे थे. कुछ लोग दीवार से चिपक कर प्रैक्टिस कर रहे थे कि ग्रुप डिस्कशन में कैसे बोलना होगा, बॉडीलाइन कैसे रहेगी इत्यादि.

Pradip
मैंने भी मौका देख कर कुछ उम्मीदवारों से सवाल पूछने शुरू कर दिए.
मैंने प्रदीप से पूछा की इधर क्यों आये ?
तो वही पुराना सालों से चलने वाला जवाब, मुझे कुछ कर दिखाना है अपनी लाइफ में.
फिर मैंने पूछा की प्रदीप तुम पढ़ लिख कर भी कुछ कर सकते हो फिर रोडीज ही क्यों?
तो वो बोला बस ऐसे ही एक बार टीवी पर आ गया तो लाइफ सेट. टीवी पर के बाद फेम कितनी तेज़ी से मिलता है ये सबको पता है, उतना पढ़ने से नहीं मिलता.










सबसे ज्यादा भीड़ 18 से 26 के युवाओं की थी. ऑडिशन में हर कोई अपने तरीके से तैयारी कर रहा था, कोई उठक-बैठक लगा कर जिम के पैसों को साबित करने में तुला हुआ था तो कोई चुटकुले सुना कर माहौल को शांत और अपने आपको पक्का टाइम पास बताने में. 











क्रू मेम्बर का काम मुझे सबसे ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि जहां वो एक तरफ उम्मीदवारों से सख्त थे. वहीँ वो ये भी चाहते थे की कोई बिना ऑडिशन दिए ना जाए. बस उसकी उम्र 18 से कम ना हो. क्रू मेम्बर में प्रोडक्शन और कैमरा यूनिट थी. जिनमे कुछ उपर से नारियल बनने का प्रयास कर रहे थे पर उनको देख कर लगता था की वो अंदर से भी नारियल ही थे. मुझे रोडीज़ क्रू की एक बात सबसे अच्छी लगी की उनको इस बात का बिलकुल भी घमंड नहीं था, वो उतने ही शांत और निर्मल थे जितनी की गहरी नदी होती है. देखने वालों को इसका एहसास ही नहीं होता की वो अंदर कितनी गहरी है. सब से सब अपना तन और मन लगा कर सारे प्रयास कर रहे थे फिर वो चाहे काम बड़ा हो या छोटा.
Roadies crew managing lines 

Activity 

Audition line




ऑडिशन के बाद GD(ग्रुप डिस्कशन) था. इसमें रोडीज की ओर से एक मेंटोर रखा गया था. जो हर प्रतिभागी की योग्यता का आकलन करते थे. ये भी कुछ कम रोचक काम नहीं था क्योंकि मेंटोर को कुछ ही सेकेंड में प्रतिभागी की क्षमता का आकलन करना होता है जोकि छोटा काम नहीं है. आपके पास सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी जिसे आपको पूरी शिद्द्त के साथ पूरा करना होता है और इसी पर पूरे शो का दामदार होता है.अभी ग्रुप डिस्कशन में थोड़ा समय था, शायद मेंटोर थोड़ा थक गयी थी. तो मैंने भी सोचा तब तक क्रू मेम्बर का ही पोस्टमॉर्टम किया जाए.
फिर मैंने रोडीज से पिछले ४ साल से जुड़े एक कैमरामैन से बात करना शुरू किया . सबसे पहले तो में उनको अपना परिचय दिया, तो जनाब बड़े ही मजाकिया अंदाज़ में बोले यार पहले आराम से बैठ तो जाओ और पारले जी का पैकेट मेरे ओर बढा दिया. मैंने भी बड़ी ही नजाकत से उनका नाम पूछा और भी शुरू कर दिए सवालों के बाण. मुझे लगा की यही वो मौका है जिस पर में चौका मार सकता हूँ.   
आप कब से रोडीज के साथ है ?
करीब ४ साल से.
कैसा रहा अब तक अनुभव?
अब तक तो अच्छा है ?
अब तक का सबसे अच्छा अनुभव?
रोडीज के साथ काम करिये, आपका हर पल मजेदार और रोचक होगा. यहां एक तरह का संसार है जिसे हम रोडीज कहते हैं और सब उसी के हिस्से और सदस्य है. हम हँसते हैं, झगड़ते हैं, अपने सुख-दुःख बाटते हैं बिलकुल एक परिवार की तरह.
कभी लगा की रोडीज ज्वाइन करके गलत किया क्योंकि काम का कोई वक्त नहीं होता है?
नहीं. शुरू से ही मुझे खुद कोई भी काम करने का टाइम नहीं था बस वही आदत इधर भी है. कभी कभी तो चीजे इतनी तेज़ी से बदलती है की पूछिए मत.
फिर जब मैंने उनकी फोटो के लिए कहा तो जनाब शरमाते हुए बोले अरे नहीं यार फोटो मत लो. फिर भी मैंने ले ही ली फोटो.
Roadies Cameraman 
उसके बाद हम ग्रुप डिस्कशन शुरू हुआ करीब २० लोगों की उसमे बुलाया गया था. उनको लाइन से बैठा दिया गया. फिर शुरू किया गया उनके नज़रिए का आकलन. टॉपिक था क्या स्कूलों में कंडोम मशीन लगानी चाहिए या नहीं. मेंटोर ने जैसे ही टॉपिक बताया कि सारे के सारे लड़के ऐसे टूट पड़े कि मानो भूखे शेर के आगे गोश्त का टुकड़ा रख दिया गया हो. फिर मेंटोर ने सबको समझाया और सबको बोलने के लिए करीब ३० सेकंड दिए. उनको उन्ही ३० सेकंड में बोलना था. कुछ ने थोड़ा समय लिया किसी ने १० सेकंड में ही बता दिया कि उनकी क्या सोच है. तो किसी ने ३० से भी ज्यादा का समय लिया पर अपनी सोच को एक दिशा नहीं दे पाए. खैर हमने हर एक को सुना और देखा. किसी की सोच पर हँसी भी आयी, तो किसी कि सोच पर दया.




उसके बाद हमें बताया गया कि अगर हम सभी ने अपने-अपने हिस्से का काम कर लिया गया हो तो हम रघु और राजीव से अब मिल सकते हैं. मैं बहुत देर से इसी का इंतज़ार कर रहा था. फिर तो मानो मेरे शरीर में फुर्ती आ गयी. हम सब रघु और राजीव से मिलने के लिए आतुर थे.
इसके बाद हमें एक कमरे में ले जाया गया जहां राजीव पहले से बैठे हुए थे. उन्होंने हमारा स्वागत उठ कर किया. और बड़े आदर से एक शिष्ट आगंतुक कि तरह बैठने को कहा. हम अभी बैठना के लिए सीट ढूंढ ही रहे थे कि पीछे से रघु भी आ गए. राजीव और रघु के चेहरे में कुछ खास अन्तर नहीं है पर अगर आप गौर से देखेंगे तो आपको पता चल जायेगा कि कौन रघु है और कौन राजीव? मैंने एक बात और गौर की, राजीव के  चेहरे में एक चुलबुलाहट झलकती है जबकि रघु का चेहरा उपर से सख्त, गम्भीर स्वाभाव होने के साथ थोड़ा बहुत ही दया रहित मालूम होता था. यही वो सब चीजे है थी जो मैंने सबसे पहले गौर करी. फिर उन दोनों के साथ हम सभी लोग बैठ गए. एक राउंड टेबल के चारो तरफ. फिर एक दूसरे से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. पहले रघु और राजीव ने हम सभी का अभिनन्दन किया. फिर सारी बातचीत एक इंटरव्यू में बदल गयी.
सब एक से बढ़ कर के सवाल पूछ रहे थे.
Raghu & Rajiv @Photo@Christine 
मैंने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए सवाल पूछ ही लिया. मैंने पूछा की क्या अपने सोचा था कि रोडीज इतना हिट होगा या इसको इतना जबरदस्त रेस्पोंस मिलेगा.
राजीव( हँसते हुए)- हाँ... फिर नहीं हमने नहीं सोचा था.
उसके बाद एक सवाल, फिर एक सवाल और कई जवाब. ऐसा करीब १३ मिनट तक चला. मुझे लग रहा था कि रघु और राजीव को मैं बरसों से जानता हूँ. क्योंकि वो जीतने क्रूर और दानव टीवी पर थे यहां उतने ही विनम्र और शालीनता से बातों का जवाब दे रहे थे. किसी उनकी इसी बात पर चुटकी भी लेनी चाही पर उन्होंने कुछ ऐसा किया और कहा कि १० सेकंड के लिए माहौल में सन्नाटा छा गया.


पर जो भी कहिये इंटरव्यू हुआ बड़ा धासु. मैं राजीव के बिलकुल बगल में और रघु के ठीक सामने बैठा था. और अपना कैमरा लगातार ऑन किये हुए था. इसी बीच एक भूतपूर्व रोडीज़ की एंट्री हुई. फिर उन्होंने भी अपने तजुर्बे और आज के दिन का आखों देखा हाल हमें बताया.
अब हमारे जाने का समय हुआ तो उसी के साथ मेरे दिमाग में कुछ सवाल मेरे दिमाग में गूंजे. में जाते जाते अपना कैमरा ऑन रखा और सवाल पूछता रहा. रघु ने भी बड़े ही इत्मीनान से उनका जवाब दिया.
जाते जाते उनके साथ बिताये पल बहुत ही अच्छे थे.
मेरे रोडीज़ का सफर दिल्ली में तो शानदार रहा. कुछ रोडीज़ के दीवानों से मुलाकात और रोडीज़ के पीछे काम करने वाले. फेम से अंजान दीवानों तक सबसे मुलाकात शानदार रही. रघु और राजीव के तो क्या कहने. वो सिर्फ टीवी पर ही इतने सख्त और दयारहित दिखते हैं असलियत में वो बिलकुल इसके विपरीत हैं.
रोडीज़ की सफलता की कामना के साथ मैंने भी रोडीज़ के सेट से फिर कभी, कहीं और मिलने का वादा करके अलविदा कहा.