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Thursday, December 13, 2012

Book Review BANKSTER by Ravi Subramaniam


The Bankster Book Book Review for blogadda

The story revolves around different places across the globe .giving the description of various places so apt and true to life. This book takes us from Angola to Cochin to Vienna to Mumbai. Each location introduces different stories with different characters weaving different plots altogether.
Connecting these stories and maneuvering with multiple scenarios with various characters spanning different continents playing simultaneously, the story makes for a good read. In the first few chapters you feel like lost in several small stories but as the story takes it pace, all pieces fall into place giving you a crystal-clear  picture of a nail-biting plot.
Being a banker himself, Ravi Subramaniam could weave the story well and people in such a manner that even a layman with no banking background would not find difficulty in understanding the story.
Through his story the author has also highlighted his knowledge, observation skill and his interest in world happenings, giving the tinge oI liked the way how India’s emerging culture which is exponentially rising into the corpf present times.
The story keeps moving back and forth between the events – how the protest came into being, how their planning and effort to rebuff the govt. stand half of the story, it un-envelopes it all, pacing steadily lifelessly.
The second half puts some spirit into the thriller when the murders portrayed as accidents begins to take place. The mind the starts working as a spy, goes on connecting the facts of the happened incidents, trying to unravel the plot. But after going into 3/4th of the book, an ex-banker or investigative reporter puts the story on a high-speed train, figuring out the motives and truth behind all the deaths at the bank. This part is like ‘Sherlock Holmes’ movies, the investigation goes on proving the hypothesis with evidence coming out from under the carpets. And finally, the truth is disclosed to everyone. Both the plots converge to present a big fraudulent scheme to stop commissioning of Nuclear Plant involving key position of the GB2 bank and blood diamonds. The story ends with the culprit embracing death  and the resulting repercussions of the truth.
Reading this novel, confirmed me that ‘Banking’ is a boring yet can be made interesting trade these kind of stories creating suspense and actually bring adventure in lives though keeping them at risk. Even to charge up the readers, the ex-banker was converted into a detective. It was this investigative character which made the book worth while reading. Anyways, the book was an overall great experience, while these kind of books always test the excellence of your grey cells. 

Ravi Subramanian is an alumnus of IIM Bangalore, has spent two decades in the world of global banks in India. In 2008, he won the Golden Quill Readers Choice award for his debut novel, ‘If God was a Banker’ and is one of the bestselling authors of India.
Name: The Bankster
ISBN: 978-81-291-2048-9
Cost: Rs.250/-
Pages: 358
This review is a part of the Book Reviews Program at BlogAdda.com. Participate now to get free books!

Thursday, October 4, 2012

मेट्रो में लद्दाख का अनुभव


मेट्रो में लद्दाख का अनुभव 

लद्दाख के बारे में मुझे सबसे पहले जो याद आता है वो है बेहतरीन नज़ारा, जो सिर्फ टीवी में देखा है. लद्दाख मुझे शुरू से ही अच्छा लगता है. पर दूर इतना है पूछो मत. आज़ादी से पहले जब आज़ादी के आन्दोलन होते थे तो सबको दिल्ली में प्रदर्शन करने के लिए कहा जाता था. चूँकि तब यातायात के साधन पर्याप्त नहीं थे इसलिए किसी ने कह दिया कि दिल्ली अभी दूर हैपर शेर को सवा शेर मिलते हैं. वक्ताओं ने आन्दोलन करने वालों में इतना जोश भर दिया और "दिल्ली अभी दूर है" का नारा "दिल्ली अब दूर नहीं" में बदल गया. इस नारे को बदलने में कितना समय लगा ये तो पता नहीं पर लद्दाख भी दूर है का नारा मेरे लिए पिछले कई वर्षों से नहीं बदला.

सुना है लद्दाख घूमने के लिहाज़ से बहुत कि उत्तम जगह है. हर साल देश के कोने कोने से बहुत सारे लोग साल लद्दाख जाते हैं. कुछ कार से जाते हैं से कुछ मोटरसाइकिल से. वैसे लद्दाख जाने का मज़ा जो बाईक से है वो शायद से किसी और चीज़ से होता है. मेरे कई जानने वाले हैं जो लगभग हर साल लद्दाख जाते हैं. वो भी मुझे अक्सर बोलते हैं चल यार एक बार तो चलो. पर हाय रे किस्मत! मैं कभी ना जा सका उनके साथ.

सिर्फ टीवी पर देख देख कर मन को शांत करता हूँ. पर ये कसक मेरे दिल में पिछले कई साल से साँस ले रही है और हर बार लगता है की कहीं ये आखिरी साँस ना हो. ना जाने कितनी बार झटके दे दे कर इसको जिंदा किया है. उसके बाद हर बार बोलता हूँ आल इज़ वेल. और अगली बार के लिए टरका देता हूँ. मेरी इन सारी तमाम परेशानी को शायद कोई सुन रहा था, शायद कोई अपना!

जब से मेट्रो चली है और मेरी कार्यस्थल गुडगाँव हुआ है मैंने लद्दाख को मिस करना लगभग छोर सा दिया है. सुबह ऑफिस जाने की चिंता में रात में सो नहीं पाता, और सुबह उठते ही फिर से नींद हमला कर देती है. मुझे तो लगता है नींद भी ब्लैक होल से कम नहीं है जैसे ब्लैक होल में जो जाता है वापस नहीं आता वैसे नींद के साथ है. आप जितना सो नींद उतनी ही आती है. ये नहीं की चलो 6-7घंटे हो गए तो मत आओ. पर नींद के साथ ऐसा  नहीं है. लगता है जितना सो उतना कम है.

उसके बाद घर से निकलने तक सारे काम मल्टीटास्किंग बन के करना पड़ता है. २-२ काम एक साथ. उसके बाद भागो, मेट्रो को पकड़ने के लिए. आदमी पैदल भी चलता है तो कुछ ना कुछ करता ही रहता है. उसके बाद संघर्ष करो मेट्रो में चढ़ने के लिए. जैसे लद्दाख की किसी पहाड़ी पर चढ़ा जाता है. लाइन में लगते लगते मेट्रो में एंट्री के लिए मेट्रो कार्ड लगाओ तो पता चलता रीचार्ज खतम हो गया, अब फिर भागो बाहर और फिर भाग कर अंदर आओ.


फिर भागते भागते प्लेटफार्म पर जाओ और ठीक उसी जगह खड़े हो जहाँ गेट खुलता है और जैसे ही उतरने वाले उतर जाएँ वैसे ही चढ़ जाओ. वरना सबसे आखिर तक इंतज़ार करो और गेट बंद होने से पहले थोड़ी सी बची जगह में एडजस्ट करो. और हांफते हांफते मेट्रो के इस सफ़र का अनद लो क्योंकि मेट्रो में भी लाद्द्ख की तरह oxygen की कमी है.    



Tuesday, September 11, 2012

बरसात की बूँद


गालों पर तेरे बरसात का पानी,
हवाओं से कांपते होंठ गुलाबी.
नशीली आँखों का रंग आसमानी,
नाक पर गुस्सा है बेमानी.

सिकुड कर तेरा बैठना,
जैसे फूल की हो खिलने की तैयारी.
हवा के झोके ने भी ठानी,
तेरे जुल्फों से करनी थी जैसे उसे मनमानी.

बार-बार तेरे गैसुहों का लहराना कर आँखों पर आना,
तेरा प्यार से उनको संवारना.
झोंको के साथ तेरी खुशबू का आना,
हर साँस पर धड़कन का रुक सा जाना.
@csahab