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Friday, February 18, 2011

मासूम बचपन


मेरे और मेरे भतीजे अरनव के बीच ऐसा होता है, तो सोचा सब चीजों को शब्दों के रूप में आपके सपने प्रस्तुत कर दूँ । आशा करता हूँ मेरा ये प्रयास आपको अच्छा लगेगा ।
               मासूम बचपन 
चंचल आँखों के नए सपने, हर रोज खिलौनों से खेले ।
अपनी हर बात को मनवाती, तेरी ये मासूम ऑंखें ।
हर सवाल जवाब बन जाता, तेरा हर सवाल और बड़ा हो जाता ।
मन मार कर या दिल को समझाकर, होता वही जो तेरा मन चाहता ।
जब तेरी नटखट चाल को देखता, बस मुस्कुरा कर गले लगाता ।
३ के बाद ५ सुनाता, ऑंखें दिखाने पर ४ दोहराता ।
घोड़ा बनवा कर पीठ पर चढ़ता, इंडिया गेट और मॉल घुमवाता ।
दादी से होती हैं सारी बातें, हम पूछे तो फिर बस सुनता जाता ।
रात को इनका सूरज उगता, बिस्तर पर हैं तारे गिनता ।
खाने से इनका बैर है रहता, मूड में हो तो रसोगुल्ला है चलता ।
ऑटो को जब ओटो कहता, पलट-पलट कर मम्मी को देखता ।
खेल-खेल मैं खाना खाता, खाते-खाते खेल है खेलता ।
नंगा हो तो हाथ लगाता, देख लिया –देख लिया खुद ही चिल्लाता ।
पहन कर नए टिप टॉप कपड़े, अकड़ कर चल कर दिखाता ।
देख कर तेरा हँसता चेहरा, पूरे दिन की थकान भूल जाता ।
कैलकुलेटर को मेज़ पर रख कर, मेरा भी है लैपटॉप बताता ।
ऑफिस को घर के बाहर छोड़ कर, मैं भी तेरी दुनिया में खो जाता ।