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Thursday, December 13, 2012

Book Review BANKSTER by Ravi Subramaniam


The Bankster Book Book Review for blogadda

The story revolves around different places across the globe .giving the description of various places so apt and true to life. This book takes us from Angola to Cochin to Vienna to Mumbai. Each location introduces different stories with different characters weaving different plots altogether.
Connecting these stories and maneuvering with multiple scenarios with various characters spanning different continents playing simultaneously, the story makes for a good read. In the first few chapters you feel like lost in several small stories but as the story takes it pace, all pieces fall into place giving you a crystal-clear  picture of a nail-biting plot.
Being a banker himself, Ravi Subramaniam could weave the story well and people in such a manner that even a layman with no banking background would not find difficulty in understanding the story.
Through his story the author has also highlighted his knowledge, observation skill and his interest in world happenings, giving the tinge oI liked the way how India’s emerging culture which is exponentially rising into the corpf present times.
The story keeps moving back and forth between the events – how the protest came into being, how their planning and effort to rebuff the govt. stand half of the story, it un-envelopes it all, pacing steadily lifelessly.
The second half puts some spirit into the thriller when the murders portrayed as accidents begins to take place. The mind the starts working as a spy, goes on connecting the facts of the happened incidents, trying to unravel the plot. But after going into 3/4th of the book, an ex-banker or investigative reporter puts the story on a high-speed train, figuring out the motives and truth behind all the deaths at the bank. This part is like ‘Sherlock Holmes’ movies, the investigation goes on proving the hypothesis with evidence coming out from under the carpets. And finally, the truth is disclosed to everyone. Both the plots converge to present a big fraudulent scheme to stop commissioning of Nuclear Plant involving key position of the GB2 bank and blood diamonds. The story ends with the culprit embracing death  and the resulting repercussions of the truth.
Reading this novel, confirmed me that ‘Banking’ is a boring yet can be made interesting trade these kind of stories creating suspense and actually bring adventure in lives though keeping them at risk. Even to charge up the readers, the ex-banker was converted into a detective. It was this investigative character which made the book worth while reading. Anyways, the book was an overall great experience, while these kind of books always test the excellence of your grey cells. 

Ravi Subramanian is an alumnus of IIM Bangalore, has spent two decades in the world of global banks in India. In 2008, he won the Golden Quill Readers Choice award for his debut novel, ‘If God was a Banker’ and is one of the bestselling authors of India.
Name: The Bankster
ISBN: 978-81-291-2048-9
Cost: Rs.250/-
Pages: 358
This review is a part of the Book Reviews Program at BlogAdda.com. Participate now to get free books!

Thursday, October 4, 2012

मेट्रो में लद्दाख का अनुभव


मेट्रो में लद्दाख का अनुभव 

लद्दाख के बारे में मुझे सबसे पहले जो याद आता है वो है बेहतरीन नज़ारा, जो सिर्फ टीवी में देखा है. लद्दाख मुझे शुरू से ही अच्छा लगता है. पर दूर इतना है पूछो मत. आज़ादी से पहले जब आज़ादी के आन्दोलन होते थे तो सबको दिल्ली में प्रदर्शन करने के लिए कहा जाता था. चूँकि तब यातायात के साधन पर्याप्त नहीं थे इसलिए किसी ने कह दिया कि दिल्ली अभी दूर हैपर शेर को सवा शेर मिलते हैं. वक्ताओं ने आन्दोलन करने वालों में इतना जोश भर दिया और "दिल्ली अभी दूर है" का नारा "दिल्ली अब दूर नहीं" में बदल गया. इस नारे को बदलने में कितना समय लगा ये तो पता नहीं पर लद्दाख भी दूर है का नारा मेरे लिए पिछले कई वर्षों से नहीं बदला.

सुना है लद्दाख घूमने के लिहाज़ से बहुत कि उत्तम जगह है. हर साल देश के कोने कोने से बहुत सारे लोग साल लद्दाख जाते हैं. कुछ कार से जाते हैं से कुछ मोटरसाइकिल से. वैसे लद्दाख जाने का मज़ा जो बाईक से है वो शायद से किसी और चीज़ से होता है. मेरे कई जानने वाले हैं जो लगभग हर साल लद्दाख जाते हैं. वो भी मुझे अक्सर बोलते हैं चल यार एक बार तो चलो. पर हाय रे किस्मत! मैं कभी ना जा सका उनके साथ.

सिर्फ टीवी पर देख देख कर मन को शांत करता हूँ. पर ये कसक मेरे दिल में पिछले कई साल से साँस ले रही है और हर बार लगता है की कहीं ये आखिरी साँस ना हो. ना जाने कितनी बार झटके दे दे कर इसको जिंदा किया है. उसके बाद हर बार बोलता हूँ आल इज़ वेल. और अगली बार के लिए टरका देता हूँ. मेरी इन सारी तमाम परेशानी को शायद कोई सुन रहा था, शायद कोई अपना!

जब से मेट्रो चली है और मेरी कार्यस्थल गुडगाँव हुआ है मैंने लद्दाख को मिस करना लगभग छोर सा दिया है. सुबह ऑफिस जाने की चिंता में रात में सो नहीं पाता, और सुबह उठते ही फिर से नींद हमला कर देती है. मुझे तो लगता है नींद भी ब्लैक होल से कम नहीं है जैसे ब्लैक होल में जो जाता है वापस नहीं आता वैसे नींद के साथ है. आप जितना सो नींद उतनी ही आती है. ये नहीं की चलो 6-7घंटे हो गए तो मत आओ. पर नींद के साथ ऐसा  नहीं है. लगता है जितना सो उतना कम है.

उसके बाद घर से निकलने तक सारे काम मल्टीटास्किंग बन के करना पड़ता है. २-२ काम एक साथ. उसके बाद भागो, मेट्रो को पकड़ने के लिए. आदमी पैदल भी चलता है तो कुछ ना कुछ करता ही रहता है. उसके बाद संघर्ष करो मेट्रो में चढ़ने के लिए. जैसे लद्दाख की किसी पहाड़ी पर चढ़ा जाता है. लाइन में लगते लगते मेट्रो में एंट्री के लिए मेट्रो कार्ड लगाओ तो पता चलता रीचार्ज खतम हो गया, अब फिर भागो बाहर और फिर भाग कर अंदर आओ.


फिर भागते भागते प्लेटफार्म पर जाओ और ठीक उसी जगह खड़े हो जहाँ गेट खुलता है और जैसे ही उतरने वाले उतर जाएँ वैसे ही चढ़ जाओ. वरना सबसे आखिर तक इंतज़ार करो और गेट बंद होने से पहले थोड़ी सी बची जगह में एडजस्ट करो. और हांफते हांफते मेट्रो के इस सफ़र का अनद लो क्योंकि मेट्रो में भी लाद्द्ख की तरह oxygen की कमी है.    



Tuesday, September 11, 2012

बरसात की बूँद


गालों पर तेरे बरसात का पानी,
हवाओं से कांपते होंठ गुलाबी.
नशीली आँखों का रंग आसमानी,
नाक पर गुस्सा है बेमानी.

सिकुड कर तेरा बैठना,
जैसे फूल की हो खिलने की तैयारी.
हवा के झोके ने भी ठानी,
तेरे जुल्फों से करनी थी जैसे उसे मनमानी.

बार-बार तेरे गैसुहों का लहराना कर आँखों पर आना,
तेरा प्यार से उनको संवारना.
झोंको के साथ तेरी खुशबू का आना,
हर साँस पर धड़कन का रुक सा जाना.
@csahab 

Monday, September 3, 2012

अहसास


दूर रह कर भी कितने पास हो तुम,
मेरी साँस की आस हो तुम.
महसूस होता है जेहन तक तू,
चाहता हूँ और करू महसूस तुझे.
हर लेती साँस के साथ,
करता हूँ जब ऑंखें बंद
चेहरा नज़र आता है तेरा
वो मासूम अदा,
अल्हड हंसी,
वो जुल्फों का अँधेरा,
वो गुलाबी होंठों का नशा.
आज भी महसूस करता हूँ तुझे इन हवाओं में,
तेरी छोड़ी हुई जगह के निशानों में. 
Copyright @csahab

Wednesday, May 2, 2012

रुको नहीं, थको नहीं, किसी से तुम झुको नहीं.


रुको नहीं, थको नहीं, किसी से तुम झुको नहीं.
दिक्कतें हज़ार हो,
मुश्किलों का पहाड़ हो.
बन कर रोशनी तुम,
मोड़ दो अँधेरे का मुँह.
रुको नहीं, थको नहीं, किसी से तुम झुको नहीं.
लोग कहेंगे, कहते रहेंगे,
कुछ ना करने वाले सिर्फ बात करेंगे.
धार लगा अपनी हिम्मत को,
मान से लगा आग सबके अभिमान को.
रुको नहीं, थको नहीं, किसी से तुम झुको नहीं.
रगों में दौड़ते लहू को तुम इतनी ताप दो,
गर खड़े हो भीड़ में तो चमक सूरज के समान हो.
तूफ़ान भी ना कर पायेगा अँधेरा,
जब इरादे फौलाद हो.
रुको नहीं, थको नहीं, किसी से तुम झुको नहीं.
हार के डर जिसने दौड़ना ही छोड़ दिया,
मैदान देखने से पहले हार से वो हार गया.
जीतते हैं वो हमेशा जो करते प्रयास हैं,
हर सफल कहानी के पीछे असफलता का इतिहास है.
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@csahab.com 

Friday, January 13, 2012

प्यार का बर्थ डे



मेरी दिल्ली. कहने को तो ये सबकी है. थोड़ी सी मेरी भी. अब मैं ऐसा कह सकता हूँ क्योंकि दिल्ली अब मेरी यादों में भी बस चुका है. मुझे रहते हुए वैसे तो कई साल हो गए हैं. पर आज भी वो पल याद है जब मेरी तुमसे मुलाकात हुई थी. कोई 7 साल पुरानी 19 जुलाई २००४ की बात है.  मैं एक छोटे से शहर से दिल्ली पढ़ने आया था. वो शहर इतना भी छोटा नहीं था पर दिल्ली जितना खुलापन अभी वहां नहीं पंहुचा था. मुझे दिल्ली की हर चीज़ नई-नई और अच्छी लग रही थी फिर वो चाहे बस हो या उसके कंडक्टर. उनके टिकट काटने से लेकर बाँटने तक का तरीका मुझे बड़ा अच्छा लगता था.

मैं कॉलेज रोज़ बस से जाता था. हर दिन एक ही टाइम, एक ही बस और लगभग एक ही तरह की सवारी. पर उस दिन कोई और भी चढ़ा था उस बस में. जैसे कोई चिड़िया किसी अनजाने घोसले में जा कर सकुचा जाती है वैसे ही वो भी बस में चढ़ते वक्त थी. नज़रें झुकी-झुकी, होश उड़े-उड़े. हर कदम फूँक-फूँक के रख रही थी. शायद ही उसने बस में गौर किया होगा की पूरी बस उसे ही देख रही थी. इतने में बस वाले ने बस आगे बढ़ा दी. उसने तुरंत बस की सीट को पकड़ कर बड़े ही होले से कंडक्टर से पूछा:
भईया ये बस मंडी हाउस जायेगी!”.
बस वाले ने हाँ में गर्दन हिलाई क्योंकि उसका मुंह मसाले से भरा था. कंडक्टर ने बेरुखी से 10 रु का टिकट आगे बढ़ा दिया. टिकट 10 मिनट तक उसने अपने हाथ में रहा क्योंकि मोहतरमा ने रुपये अपने पर्स के ना जाने किस तिलस्म में रख दिया था जो उसे नहीं मिल रहा था. हर बार एक-एक हिस्से को बड़े ही इत्मीनान से देखा जाता और हर बार निराशा मिलती. वो इस बार से बेखबर थी की पूरी बस पिछले कुछ मिनट से उसे ही देख रही है. पर शायद इस बार उसने गौर कर लिया और ये बात उसे और भी हताश कर रही थी कि वो ऐसा क्यों कर रही है. इससे ज्यादा दुःखी वो शायद इस बात से भी थी कि उसे अपने ही पर्स में रुपये नहीं मिल रहे हैं. तभी उसने अपने सर पर बड़े प्यार से हाथ मारा शायद ये हाथ अपने भूलने की आदत को ले कर था. फिर उसने दुप्पटे के कोने में बांधे हुए रुपये की पोटली को खोला और टिकट के 10 रुपये दिए. यह देख कर मेरी हंसी नहीं रुकी. पता नहीं कैसे उसने मेरी तरफ मुंह कर लिया. इसके बाद तो मेरा मुंह खिड़की की तरफ था पर मुस्कान अभी भी बनी हुई थी.

लड़की कोई 5’6 इंच लंबी, दोहरा बदन, बड़ी बड़ी ऑंखें, चेहरे पर एक अजीब सी खुशी, हाथों में 3-4 चूडियाँ जो इतने हादसों के बाद भी खामोश थी, पैरों में नागरे के साथ सलीके से सिला हुआ सूट जिसे बिलकुल उसी के नाप का बनाया गया था ना छोटा ना बड़ा. ऑंखें जितनी गहरी थी उतनी ही चंचल लग रही थी. कानों में बिलकुल पतली बाली जो उनके होने का सिर्फ अहसास करा रही थी. हवा के झोकों के उड़ते बाल और साथ में उड़ता दुप्पटा जो उसे हर बार नए ढंग से परेशान कर रहा था. कभी वो दुप्पटे को संभालती तो कभी हवा से छेड़े गए जुल्फों को.

उसके साथ वाली सीट खाली थी तो उस पर किताबों का बोझ रख दिया गया, बाकी का सारा खज़ाना पर्स में जा चुके थे. वो पूरी मेहनत से बाल और दुप्पटे को संभालने में लगी हुई थी. जैसे हवा और उसकी कोई जंग चल रही थी. जब ऐसा बहुत बार हुआ तो उसने बालों को बेमन  से बैग से बैंड निकल कर बाँध लिया. शायद बालों को बांधना उसे अच्छा नहीं लगता था मुझे भी कुछ अच्छा नहीं लगा क्योंकि बाल और दुप्पटे का खेल बंद हो चुका था. पर एक नया खेल अभी भी चालू था. बाल तो बंध गए थे पर उनकी एक लट अभी भी खुली हुई थी जो फिर हवा खेलने में लग गयी बिलकुल पतंग कि तरह. मगर ये पतंग बाज़ी ज्यादा देर नहीं चली. उनको चुपचाप कानों की तरफ नाज़ुक हाथों से बढ़ा दिया गया. पतंग कि डोर कट गयी थी.

पता नहीं क्यों मुझे ये सब कुछ बड़ा अच्छा लग रहा था. वो अच्छा क्या था जो मुझे अच्छा लग रहा था उससे मैं अंजान बस के सफर का आनंद ले रहा था, पर आज मेरा मन बाहर से ज्यादा अंदर लग रहा था. तभी कंडक्टर ने आवाज़ लगायी की भईया उतर जाओ स्टॉप आ गया, उसे कल देख लेना. मुझे खुद पर बड़ी हैरानी हुई कि मैं उसे देखने में इतना खो कैसे गया.
मंडी हाउस आ चुका था. मैं उसके पीछे-पीछे उतर गया. उसके बालों से अभी भी भीनी-भीनी खुशबु आ रही थी. मैं उस खुशबू के राज़ का पर्दाफाश करने ही वाला था कि एक सुगर फ्री शहद से लिपटी मीठी आवाज़ ने तमाम खुशबु को अपने अंदर समेट लिया. सुगर फ्री इसलिए क्योंकि इस आवाज़ को आप कितनी बार भी सुन सकते थे और आपको कोई नुकसान भी नहीं होता. खुशबू को पहचनने में अपनी ऑंखें बंद कर के सारी इन्द्रियों को जगा रहा था जो उसकी आवाज़ के साथ खुली. उसने बड़े ही दिलकश अंदाज़ में मेरे ही कॉलेज का नाम ले कर पूछा
क्या आपको पता है ये कॉलेज किधर है. मुझे मंडी हाउस से पास ही बताया था”.
मैंने कहा कि मैं भी वहीँ पढता हूँ चलिए में ले चलता हूँ. उसने बिना कुछ कहे सुराही वाली गर्दन से चलने की रज़ामंदी दे दी. मैं भी बड़े मगन से चलने लगा जैसे पता नहीं क्या हुआ हो मुझे. दिल्ली के चिपचिपे मौसम में पता नहीं कहाँ से मुझे थोड़ी-थोड़ी सर्दी लग रही थी. हर 5 कदम पर सोचता कि चलो कोई बात करता  हूँ. जैसे आप किसमें पढ़ती हैं, या फिर आप क्या पढ़ती हैं. ऐसे बेतुके से सवाल पर हिम्मत ने वैसे ही हार मान ली थी जैसे अँधेरे को देख कर परछाई मान जाती है. पर उसने ख़ामोशी के उस तूफ़ान को अपने नाम के साथ उड़ा ले गयी. मेरा नाम आकृति है. जब उसने अपना नाम बताया तो रोड पर चलती बस ने भी होर्न बजाया मैंने उसका नाम नहीं सुन पाया. मैंने कहा
क्या नाम बताया अपने अपना?

उसने कहा अभी तो बताया आकृति. एक बार में सुनाई नहीं देता क्या! मुझे हँसी आ गयी क्योंकि मेरा अंदाज़ा सच निकला कि वह समुंद्र का वो गहरा हिस्सा है जो उपर से ही शांत है पर अंदर तूफ़ान जैसी हलचल होती है.

जिस लहजे से वो शब्द कहे गए थे वो आज भी मेरे ज़ेहन में वैसे ही ताज़े हैं जैसे कल कि बात हो. अब तो बातों का बाँध टूट चुका था. मंडी हाउस से हमारा कॉलेज कोई 500 मीटर होगा. पैदल जाने के अलावा कोई और जरिया नहीं होता था. उस दिन के वो 500 मीटर पता नहीं कैसे सिमट कर चंद कदम में बदल गए थे, लगा कि अभी 5 कदम ही तो हुए  थे. वो MA करने आयी थी दिल्ली इकोनोमिक्स से. उसने वो सब बता दिया था जो वो कॉलेज आने तक बता सकती थी. फिर उसके और मेरे रास्ते वहां से अलग-अलग हो जाते थे.

उस दिन के बाद वो बस, कंडक्टर, ड्राईवर सब से सब अपने-अपने से लगते. मैं एक साल का  PG कोर्से कर रहा था. और वो 2 साल वाला मास्टर कोर्स. कुछ दिनों के बाद ही मुझे अहसास हो गया कि क्यों उसके बिना वो 500 मीटर 5000 मीटर और उसके साथ 5 मीटर में कैसे बदलने लगे.
उसके बाद वो 500 मीटर का सिलसिला उसके जन्मदिन तक चला. उस दिन को भी मैं आज तक नहीं भूल पाया क्योंकि वो आज भी मेरे जीवन के सबसे खास लम्हों में से एक है. जो मेरे दिल के एक कोने में मेरी हर धड़कन के साथ जी रहा है. उसने उस दिन चलते-चलते बताया आज मेरा बर्थडे है. मैं जहां था वहीँ रुक गया क्योंकि हम उस 500 मीटर के बाद एक दूसरे के लिए अंजान बन जाते थे. मेरे पास अब बस 450 मीटर ही बाकी थे उसके साथ उसका जन्मदिन मनाने के लिए.
अचानक ही मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. मेरी ऑंखें कुछ दूंढ रही थी. मैंने कहा
आकृति चलो तुम्हारा जन्मदिन पर केक काटते हैं.

उसने मुझे ऐसे देखा जैसे में पागल हो गया हूँ. उसने बड़े ही बनावटी अंदाज़ में कहा
हाँ-हाँ चलो चलो काटते हैं केक. तुम्हारी जेब में तो होगा ही ना निकालो.

 हम दोनों को पता था कि हम दोनों के जेब कितने रुपये थे. उन 500 मीटर में बस एक ही बसेरा था वो था अनमोल का छत वाला ढाबा. वो कोई बहुत बड़ा ढाबा नहीं था पर हमारे लिए किसी ढाबे से कम नहीं था क्योंकि हमारे लायक सब कुछ मिलता  था चाहे वो आलू के पराठे हो या चाय, नमकीन हो या फिर कई तरह की खाने पीने की चीज़. मैंने उससे 5 मिनट मांग कर अनमोल की दुकान में कुछ ढूँढने लगा. आखिरकार मुझे बर्थडे मनाने लायक लगभग सब सामान मिल गया. कम ही सही पर था तो. वो वहीँ पत्थर पर बिछे हुए बोरे के ऊपर बैठ गयी. आज फिर हवा मटरगश्ती के मूड में थी. वो एक बार फिर दुप्पटे और बालों से खेलने लगी. पर आज आकृति ने उसे ज्यादा मौका नहीं दिया. बैग से बैंड एक बार में ही मिल गया और दुप्पटे को पीठ के पीछे का रास्ता दिखा दिया गया. उसके दोनों छोरों को मिला कर बाँध दिया गया. दुप्पटा हवा के झोकों से बिना पंख के पंक्षी कि तरह तड़प रहा था.  

अनमोल की दुकान में कप केक था जो शायद मेरे लिए ही बचा हुआ था. इसके साथ ही मैंने एक प्लेट साफ़ करवा कर कप केक को करीने से सज़ा दिया. दुकान से एक जली हुई मोमबत्ती भी उठा ली, अनमोल भाई बड़े ही मजे से देख रहे थे बिना कुछ बोले उनका चेहरा सब कुछ बोल रहा था. होंठों पर उनके मंद-मंद मुस्कुराहट भी मैं देख रहा था. मैंने जल्दी से मोमबत्ती को चाकू से आधा कटा और मुंह छिल कर उसे नया जैसा बनाने की पूरी कोशिश करी जिसमें में काफ़ी हद तक सफल भी रहा. आकृति को पता चल गया फिर भी वो कुछ नहीं बोली. उसने उस कप केक को काट कर दिल्ली में अपना पहला जन्मदिन मनाया. उस दिन उसे पता चल गया की वो 500 मीटर किसी के लिए कितने अहम थे और मुझे उसके शैम्पू का नाम. वही वो दिन था जब हम उस सीमा को पार कर के पहली बार बाहर निकले होंगे. उसके बाद हर कदम एक-एक साल के बराबर लग रहा था.

अब बातों में एक अजीब सा संजीदापन शामिल हो गया था. हम दोनों की चाल अल्हड़पन/लड़कपन की सीमा को तोड़ चुकी थी. क़दमों का कर्फ्यू खत्म हो चुका था और अब वो चलने के लिए आज़ाद थे. उस आजादी ने तमाम बंदिश और सीमाओं को ना जाने कितनी बार तोडा और हर बाद अपनी नई सीमाएं बनायीं और खुद ही तोड़ दी.

आज उस बात को कोई 7 साल हो गए. मेरे पास अब दिल्ली का वोटर कार्ड है, दिल भी दिल्ली के जैसा हो गया है. आज ऑफिस से छुट्टी ली है. अब मेरा दिल्ली के बहुत बड़े इलाके में छोटा सा किराये का घर है और ऑफिस कार से जाता हूँ. तेज़ी से बदल रही दिल्ली में मंडी हाउस से वो कॉलेज आज भी उतनी ही दूर है. अनमोल भाई ने वो जगह बदल कर दिल्ली में अपना एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोल लिया है जहां आज भी कप केक मिलता है. पर आज भी वो 500 मीटर का रास्ता एक कदम भी अकेले नहीं चला नहीं जाता उसके बिना. आकृति MA करके कुछ साल दिल्ली में ही नौकरी करने लगी आज कल घर पर है और अपने 3 साल की बच्ची के साथ खेलने में समय बिताती है.

आज आकृति का बर्थडे है. हर साल की तरह मैं इस साल भी कप केक ले कर मंडी हाउस पर खड़ा हूँ. मुझे इंतज़ार है कि कब आकृति की गोद से उसी की तरह चंचल और शरारती जिसे हम प्यार से कृति कहतें है आयेगी और पापा कह कर मेरे गले से लग जायेगी. और मेरे और आकृति के साथ कदम से कदम मिला कर अपनी मम्मी का बर्थ डे 500 मीटर पैदल चल मनाएगी.

Monday, December 19, 2011

मेट्रो में ढिशुम-ढिशुम


मुझे याद नहीं मैंने फ़िल्में देखना कब शुरू किया, हाँ इतना जरुर याद है की देखी बहुत सी फ़िल्में हैं. पहले आज की तरह 24 घंटे का चैनल नहीं हुआ करते थे.एक मात्र देखने का जरिया दूरदर्शन हुआ करता था. जोकि हफ्ते में 2 बार फिल्मे देता था शनिवार और रविवार. पर हम लोगों के पास एक और भी जरिया था वो था वीडियो. जो अकसर हम किराये पर लाते थे. जिस समय किराये पर वीडियो लाने का चलन था उस समय वीडियो वाले की बड़ी चाँदी हुआ करती थी. वीडियो देने से पहले वो 4-5 हितायतें देता साथ ही वीडियो कैसट ना छूने की सलाह देता. हम सब कुछ हाँ में कहते और ले कर चले आते.

उस समय 3-4 स्टार अपने टॉप पर थे. मिथुन, गोविंदा, अमिताभ और जितेंदर उनमे से कुछ नाम है. हम पूरी रात के लिए विडियो किराये पर लेते थे. वैसे मेरा मोहल्ला था तो बहुत बड़ा पर हमारी बोलचाल कम से थी, और उतना ही कम आने-जाना व्यव्हार. सिर्फ कुछ ही परिवार थे जिनके घर आना जाना होता था. तो जब घर में वीडियो लाया जाता तो उनको बुला लिया जाता और घर में एक छोटी-मोटी पार्टी का माहौल होता. चूँकि हम छोटे थे तो बड़ा मजा आता की घर पर खूब सारे लोग है. उपर से पढ़ने का कोई इरादा नहीं तो खुशी से खुशी दुगनी हो जाती थी. इन सब के बीच जो सबसे बड़ी समस्या होती कि कौन-कौन सी फिल्मे आनी है. उस समय जो चल रही होती वो तो आती ही, फिर होती दूसरी और तीसरी फिल्म कौन सी होगी. यह समस्या उस रात से 2-3 दिन पहले तक होती. अच्छा हम लोग हल्ला भी ज्यादा नहीं कर सकते थे क्योंकि डर भी लगता कहीं घरवाले भी ना डांटे और वीडियो लाने का प्रोग्राम ही रद्द ना कर दें. तो सारा काम बड़े ही चतुराई से करना होता था. आखिर में सब मिला जुला कर 2 नई फिल्मे और एक थोड़ी पुरानी फिल्म लाने का फैसला होता. बड़ों का भी ख्याल रखना पड़ता था.

फ़िल्में खाने-पीने के बाद लगभग 9 बजे शुरू होती. उस दिन खाना भी फिल्म के चक्कर में जल्दी हो जाता. हम सभी को खाने पीने में मन नहीं लगता क्योंकि अंदर से खुशी तो फ़िल्में देखने की होती और खाना पेट में जाता ही नहीं. घरवाले जैसे-तैसे करके खाना खिलवाते और फिर टीवी के आगे मंडली जम जाती. वीडियो वाला भी रात में हम ही लोगों के साथ टीवी  देखता क्योंकि उसे लगता की कहीं कोई गडबड हो गयी तो क्या होगा. इसलिए वो अपने एक जूनियर को भेजता. ना जाने कितनी तार लगाने के बाद तो VCR चलता. उसके तार लगाने के साथ ही हम सब कैसट चेक करते-करते वीडियो वाले की तरफ देखते कहीं वो देख तो नहीं रहा.

फिर वीडियो शुरू हो जाता. मुझे याद है हर वीडियो चलने के पहले एक अजीब से धुंधली लाइन आती. कुछ दिनों बाद हमे भी पता चल चलने लगा कि वीडियो अच्छा है या बुरा. मेरा मतलब प्रिंट से था, और हम पहले से बोलने लगते भईया ये कैसट खराब है बदल कर लाओ. जब भी ऐसा होता तो वीडियो वाला पता नहीं VCR के किस-किस हिस्से में फूँक मरता और वीडियो सही  चलने लगता. हमें वो वीडियो वाला उस दिन बड़ा चमत्कारी लगता और सोचते की बड़े होकर में भी वीडियो वाला ही बनूँगा. पर अगले ही पल ये सारे विचार रद्द कर के फिल्म देखने में लग जाता. मुझे फिल्मों में हीरो के साथ-साथ विलेन भी बड़े अच्छे लगते. खैर पहले जब छोटा था तो सब बराबर ही लगते पर जैसे-जैसे बड़ा हुआ तो लगता की विलेन अगर विलेन नहीं होता तो किसी हीरो से कम नहीं होता. क्योंकि हर परेशानी हीरो को ही होती है खलनायक मजे करता है. सुर, सुरा और हीरोईन से कहीं से भी कम न दिखने वाली वैम्प जो उसके साथ रहती. इतना ही नहीं वो लड़की(वैम्प) उसके लिए किसी स्तर तक जाने को तैयार रहती. वहीँ हीरो को पता नहीं क्या क्या करना पड़ता था. गाना गाने से लेकर, नौकरी करना, धक्के खाना, उसके पापा से शादी की बात करना इत्यादि. मैं कभी कभी सोचता की यार हीरो से अच्छा तो विलेन ही होता है. उसे सब कुछ पहले से मिला होता है. और वो हीरो से ज्यादा पॉवरफुल होता है. मुझे भारतीय फिल्म इतिहास के विलेन में कुछ बहुत ही खास और अच्छे लगते हैं/थे. एक तो सदाबहार अमरीशपुरी, फिर उनके छोटे भाई मदनपुरी. मुझे मदनपुरी की बन्दूक पकड़ने की अदा बड़ी अच्छी लगती थी. साथ एक और थे जो बन्दूक बड़ी अदा से पकड़ते थे वो थे K.N Singh. मुझे याद है संजय दत्त की एक फिल्म थी सड़क. जिसे में 1 हफ्ते में कोई 10 बार देखी होगी कारण सिर्फ सदाशिव अमरापुरकर थे. क्या एक्टिंग करी थी उन्होंने उस फिल्म में. मुझे आज भी विलेन हीरो से अच्छे हो लगते है. पुराने फिल्मों में एक बड़ी अजीब आवाज़ आती जब हीरो और विलेन के बीच लड़ाई होती वो होती थी मुंह से निकलने वाली आवाज़ ढिशुम-ढिशुम. ये बात मुझे मेरे पिता जी ने बताई क्योंकि मुझे लगता था की यह आवाज़ सच में निकलती है जब किसी दो लोगों के बीच हाथापाई होती है तो. आज उन आवाज़ हो किसी फिल्मों में सुनता हूँ तो हँसी सिर्फ चेहरे पर नहीं दिल में भी होती है.

कुछ ऐसा ही मंजर मुझे मेट्रो में देखने को मिला. मैं अपनी सीट पर बैठा किताब पढ़ रहा था तभी मुझसे अगले गेट के पास से 2 लोगों के झगडे की आवाज़ आयी. दोनों सीट को लेकर झगडा कर रहे थे. हुआ ये था की एक जनाब बैठे थे और एक जनाब खड़े थे. जो जनाब खड़े थे उनको बार–बार पैर लग रहा था. कैसे ये नहीं पता. बस उसी बात पर झगडा हो रहा था. तभी इन दोनों के बीच एक जनाब बीच-बचाव करने के लिए कूद पड़े. जो जनाब खड़े थे अब वो बैठे वाले को छोड़ कर बीच-बचाव करने वाले पर ही उल्टा सवार हो गए. दोनों की बातों में जमीन आसमान का अंतर था क्योंकि जो खड़ा हुआ आदमी था वो ऑक्सफोर्ड का पढ़ा हुआ लगता था और दूसरा हरियाणा के एक सरकारी स्कूल वाला. कुछ देर तक वैसे ही बकझक होती रही. और अचानक सन्नाटा छा गया. ये तूफ़ान के पहले की ख़ामोशी थी. फिर अचानक इस सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज़ आयी. ढिशुम-ढिशुम. हर कोई उधर ही देखने में लग गया. हरयाणवी ने अपना जलवा दिखा दिया और ऑक्सफोर्ड वाले को मेट्रो में तारे दिखा दिए. मुझे भी ऐसी उम्मीद नहीं थी. पर ऐसा हो गया. उसके अगले स्टेशन पर ऑक्सफोर्ड और हरियाणा वाले मेट्रो के नीचे थे.

Tuesday, November 8, 2011

पहचान कौन ?


अक्सर रात में जब ऑफिस से लेट घर जाता हूँ तो घर पहुच कर बड़ा अजीब लगता है. क्योंकि मेरी माता श्री को छोड़ कर सब सो चुके होते हैं. आपके पास किसी से बात करने का समय नहीं होता. सबसे बड़ी बात होती है कि कभी-कभी मेरा भतीजा जिसे रात में सुलाने के लिए नाकों चने चबाना पड़ते हैं, वो भी मेरा इंतज़ार करता है. और अपनी तोतली आवाज़ में पूछता है ओफिज से आए हो. खाना नहीं खाओगे. मेरे मना करने पर थोड़ी देर मेरे साथ बात करते-करते धीरे-धीरे सो जाता है. फिर मैं अपनी सालों पुरानी पर अब तक ना पड़ने वाली आदत से मजबूर टीवी देखने लगता हूँ. मुझे रात में टीवी देखना थोड़ा ज्यादा पसंद है. क्योंकि आप बिना किसी रोक टोक के चैनल बदल-बदल कर देख सकते हैं.  पर रात में एक समस्या भी होती है वो है जब आप चैनल बदलते हैं तो कमरा लाइट से भर जाता है और फिर नए चैनल से फिर अँधेरा हो जाता है. रात में अंग्रेजी-हिंदी फिल्मों के साथ-साथ एक सबसे अच्छी चीज़ आती है वो है टेली शॉपिंग नेटवर्क. यह आपको दुनिया की नायाब से नायाब चीजें सबसे सस्ती और टिकाऊ तरह से बेचते हैं फिर वो चाहे सोफा हो या नज़र यन्त्र या फिर चवनप्राश का दादा पॉवरप्राश.  इसके साथ एक और चीज़ आती है जो मुझे सबसे अच्छी लगती है उसका नाम है पहचान कौन? ये नाम मैंने दिया है. कारण है इसमें २ चेहरों को एक साथ मिला दिया जाता है और फिर पब्लिक से पूछा जाता है अगर आप दोनों चेहरों को पहचान चुके हैं तो अभी कॉल करिये, आप जीत सकते हैं 50000 तक ईनाम.अभी कॉल करिये.

इसमे कई बार क्या, हर बार इतने आसान और बड़े-बड़े लोगों या फिल्म स्टार के चेहरे लगाए जाते हैं कि अंधा भी पहचान ले. पर मजाल है पब्लिक का कोई बन्दा उन्हें पहचान पाए. अगर सलमान और शाहरुख खान की पिक्चर है तो लोग फोन करके कहते हैं कि आमिर खान या संजय दत्त. तब एंकर उनको बड़े प्यार से कहतें है आप बहुत करीब पहुच गए थे पर अफ़सोस ये गलत जवाब है. जल्दी से फोन करिये. फिर अगला कॉल आता है वो कहेगा अमिताभ बच्चन. फिर क्या! सुनते ही हँसी निकल जाती है. जब आप उनको कॉल करते हैं तो 10 रू प्रति मिनट का खर्चा आता है. ये बात शायद मेरे एक पड़ोसी की पत्नी को नहीं पता थी. उसको लगा कि इतना आसान सा सवाल है अगर वो बता दे तो 50000 उसके हो जायेंगे यही सोच कर उसने कॉल कर दिया. इसके बाद तो जैसे अजगर अपने शिकार को फंसाता है वैसे ही कंपनी ग्राहक को उसमे फसाती चली जाती है. और ग्राहक को पता ही नहीं चलता कि वो 10 रु प्रति मिनट से अपनी भी पैर पर कुल्हाड़ी चला रहा है. और उसे कुछ नहीं मिल रहा है. क्योंकि फोन पर वो सिर्फ अपना नाम, पता और पता नहीं क्या क्या नोट करा रहा होता है जो कि कछुआ चाल से होता है.

कुछ देर बाद पता चलता है किसी ने एक एक्टर का नाम सही-सही बता दिया पर दूसरा नहीं बता पा रहा है. फिर क्या ईनाम कि राशि बढ़ जाती है. उधर कॉल करने वाली कि धड़कन बढ़ जाती है कि ईनाम उसको मिलेगा या नहीं. आखिर में ना जाने कितने मिनट कि जद्दोजहद के बाद उसे पता चलता है कि उसे लूट लिया गया.

खैर ये तो था मेरा अनुभव, सच मानिए उस प्रोग्राम देखते वक्त में सबसे ज्यादा हँसता हूँ. ये पहचानने का खेल कभी-कभी मेट्रो में भी होता है. जब आप रोज मेट्रो में सफर करते हैं, तो आपको कुछ चेहरे हर रोज दिखाई देते हैं. और जब आप अलग-अलग समय पर यात्रा करते हैं तो आपको सारे चेहरे एक जैसे लगते हैं. और कभी-कभी लगता है इसको कहीं देखा है. वैसे मेरे साथ एक दो बार ऐसा हुआ कि मुझे मेरे साथ मेट्रो में चलने वाले मार्केट में दिखाई दिए, मैं सर पकड़ कर बैठ गया कि इसको किधर देखा है, किधर? दिमाग में सारे तीर चलाने के बाद पता चलता है, अरे ये तो मेट्रो में दिखा था. फिर क्या, लग जाता हूँ अपनी शॉपिंग करने में यही सोच कर कि अब कोई नया चेहरा दिखे, जो मुझे याद ना हो.